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अल्मोड़ा लोकसभा चुनाव आते ही एक बार बिलुप्त हो चुके जनमुद्दे लोगो की जुबान पर आने  लगे है , । जिसमे उत्तराखण्ड के आठ पर्वतीय जनपदों की अपनी विविध प्रकार की समस्याये है , जिसमे से 1972  के बाद  बदल गये पहाड़ के  सामाजिक राजनैतिक परिवेश भी शामिल है , 1972 तक जो पहाड़ सिड्यूल एक्ट का लाभ ले रहा था , अचानक उसे हटा दिया गया , जिसके कारण  पहाड़ो मे जल जंगल जमीनो की समस्याये उत्पन्न हो गई , 1972 के बाद पहाड़ो की बन पंचायते व गौचर जमीने   सरकारों की सम्पत्ति बन गई , इसके बाद किसानों को पट्टे तो दिये गये पर उन्हे नियमित करने  पर रोक जारी है , पहाड़ो की नब्बे  प्रतिशत आबादी के पास दस नाली से भी कम की मिल्कियत रह गई है , कई लोगो के पास घर बनाने के लिये जमीने नही है ,। लाखों लोग बन व बेनाप जमीनों मे बसे हुवे है जिन पर हर समय अतिक्रमण हटाने के नाम पर उत्पीड़न की तलवारे लटकी रहती है , हजारो परिवार जो सड़को के किनारे अपना ब्यावसाय खोल कर रोजी रोटी कमा  रहे है । सरकार द्वारा  ग्रामीण व शहरी क्षेत्रो मे राष्ट्रीय आजीविका  मिशन का प्राविधान करने के बाद भी लोगो को नोटिस भेजने का क्रम सरकारों द्वारा  समय समय पर चलाया जाता है , न्यायालयों भी इन लाखो लोगो के बारे मे कोई स्पष्ठ राय नही रखी जा सकी  है ।सामान्यत: रोजी रोटी  व आवास का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नही है ,बढती आबादी घटती जोत के कारण पहाड से लोगो का पलायन भी निरन्तर जारी है , शिक्षा स्वास्थ सुविधाओं की कमी के  साथ ही रोजगार की किल्लत भी एक जटिल समस्या है ।जो पलायन का कारण बनी है ।खराब सड़के पर्यटन ब्यावसाय को पलीता लगा रही है ।

आज उत्तराखण्ड़ के पहाड़ो मे जो बचे खुचे लोग है ।, वह सरकार की खाद्यान्न योजना , किसान पेन्शन योजना , व बृद्धावस्था पेन्शन योजना या मनियाड़र अर्थब्यवस्था के कारण टिके है ,।  अल्मोड़ा मुख्यालय की एक  मात्र दवा कम्पनी आल्पस बन्द पड़ी है , औद्यौगिक रूप से अल्मोड़ा एक पिछड़ा जनपद है ,ना ही यहा  रोजगार की कोई योजना प्रस्तावित है , ।बागेश्वर से निकाली जा रही खड़िया या मैग्नेसाईड मे भी स्थानीय लोग रोजगार मे पिछडते जा रहे है । पिथौरागढ मे सैन्य कैम्प होने से वहाँ ब्यापार अपेक्षाकृत ठीक है । किन्तु अब सैन्य क्षेत्र मे भी अल्पकालीक अग्निवीर योजना लागू है । स्थाई राजधानी का मुद्दा हल नही हुवा है ।

यदि धरातलीय सच्चाईयों की  बात  करे  तो पहाड़ो मे लीसा आधारित उद्योग ,ज़ड़ी बूटी आधारित उद्योग ,  फल व उद्यान आधारित उद्योग , दुग्ध उद्योग , पशुपालन , भेड व ऊन उद्योग ,  रेशम उद्योग ,  चाय उद्योग , आदि पनप सकते है , पर इनके लिये जनपक्षीय.नीतियों की आवश्यकता है , हमारे उम्मीदवार अपने किसी दृष्ठिकोण को लेकर यदि चुनाव मे  आ रहे होते तो स्थानीय विकास  सीमान्त प्रदेश की आवश्यकताये जरूर मुद्दा बन  पाते पर पहाड़ी प्रदेश उत्तराखण्ड की हालत तो लद्दाख जैसी बन रही है , । जरूरत इस बात की है कि लगातार घट रही पहाड़ की आबादी को पहाड मे रोकने के मुद्दे जोर पकडे ना कि काल्पनिक मुद्दे ,देश मे जिसकी भी सरकार बने पर सीमान्त पाद्य उत्तराखण्ड के पर्वतीय जनपदो की विकास नीति  मैदानी माडल के अनुरूप नही अपितु पहाड की जरूरतों के अनुरूप बननी चाहिये ।

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