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रामलीला में दर्शकों की भीड के बीच  केवट ने  श्रीराम के पांव  पखारे ,  केव को यह आशंका है कि यदि राम के ठोकर  से  पत्थर अहिल्या  बन सकती है तो माव क्या नही बन सकती । राम जी  केवट की  सभी आशंकाओं को दूर करके हुवे  चरण पखारमे की अनुमति दे देते है ।

केवट नाव  रूपी जीवन के  खैवैया है  जो  भवसागर से जीवन को पार लगाने वाले राम  के चरण धोकर सेवा करना चाहते  है। अहिल्ला निर्जीव पत्थर है जब पाम रूपी जीवन की पात्री रूपी अहिल्या पर ठोकर पडती है तो जीवन का संचार हो जाता है , केवट की भी यही चाहत है । ।

नाव से सरयू पार करने के बाद राम जी का सामना बनवासी  भीलो से होता है ।

भील श्रीराम ले कहते है कि हमपर धनुष नही तानों हम इस वन मे  आपके  सेवक है  भीलों से मित्रता के बाद बनवासी महिलाओ से सीता से संवाद होता है ।  वे कहती है कि आप जैसी सुन्दर स्त्री वन- वन क्यों भटक रही है ।

  सीता वनवासी महिलाओं को राम लक्ष्मण व अपना परिचय देती है , कहती है कि मै रीदा जनक की पुत्री दशरथ की पुत्रबधु  अपने पति व देवर लक्ष्मण के साथ माता पिता की आज्ञा ले बन में आये है । आगे चलकर   सीता भूख प्यास से ब्याकुल हो जाती है ।

बन मे सीता को लगी भूख व प्यास

लक्ष्मण जी पानी भोजन की ब्यवस्था करते है तब तीनों बाल्मिकी को आश्रम पहुचे , बाल्मीकि  उन्हें उन्हे चित्रकूट  मे जाने की सलाह देते है ।

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