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पहली बार भारत के इतिहास मे कश्मीर वह प्रदेश बना जब कश्मीरी पंण्ड़ितो को वहां से जांन बचाकर भागना पड़ा ।अब एक बार फिर से ऐसा ही सपना जे एन यू के छात्र देखने लगे है , इन छात्रों ने जे एन यू के कैम्पस मे एक कैम्पेन चलाई कि ब्राह्मण व बनियों भारत छोड़ो ।

आखिर इस नफरत का कारण क्या है यही सोचनीय बिन्दु है? यह जो कुछ भी कैम्पेन चलाई जा रही है इसका आधार क्या है यह नरेटिव कैसे बना क्या इसके लिये लम्बे समय से चल रहा दलित विमर्श की एक श्रंखला नही है?। पेरियार के बाद ज्योतिवा फूले , सावित्रीबाई फूले , फिर अम्वेदकर इस दलित विमर्श के नायक बने , वर्तमान में यह जो कैम्पेन चल रही है इसके लिये भीमराव अम्बेदकर का नाम लिया जा रहा है जबकि अम्बेदकर का यह मत नही है कि आर्य विदेशी थे वह मानते है कि आर्य भारतीय ही है पर वह आर्यो की धार्मिक ब्यवस्था से संन्तुष्ट नही थे । उन्होंने अपने व अपने अनुयायियो के लिये नास्तिक बौद्ध मत का चुनाव किया । अंग्रेजी शासन में लिखी गई पुस्तकों मे पहली बार यह मत प्रस्तुत किया गया कि आर्य.युरेशियन है जिसका भीमराव अम्बेदकर ने अपनी पुस्तक WHO IS SUDRA में खण्डन करते हुवे लिखा कि आर्य भारतीय ही है , युरेशियन , जिसका अर्थ है युरोप व ऐशिया के निवासी , भारत ऐशिया का ही देश है ,दलित विमर्श कहता है कि द्विज यनि ब्राह्मण , क्षत्रिय व बनिया युरेशियन है अब वह जे एन यू के माध्यम से कैम्पेन चला रहे है कि ब्राह्मण बनियो भारत छोड़ो , ब्राह्मण बनियों का बिरोध करके भीमवादी भारत मे एक नया राजनैतिक समिकरण बनाना चाहते है , इस समिकरण के अगवा , यादव , लोधी, चवर, मौर्य, कुशवाहा जैसी क्षत्रिय जातियां है, प्रजापति ,तेली,चर्मकार जैसी बनिया जातियो के कुछ लोग जो आरक्षित या ओ बी सी में है वे भी अपने आरक्षण को बचाने के लिये इस अभियान में है यह विशुद्ध रूप से राजनैतिक अभियान है , ठीक ऐसा ही अभियान कश्मीर में भी चलाया गया , ताकि वहां हमेशा के लिये इस्लामिक शासन कायम हो सके।

ब्राह्मणों भारत छोड़ो इस अभियान के समर्थन में भीमराव अम्बेदकर के विचारों के विपरीत भीम व मीम वादी यह कैम्पेन चला रहे है । इस कथन के पीछे कोई ऐतिहासिक तत्थ्य नही अपितु मिथक व कयास ही ज्यादा लगाये गये है , इतिहासकार हडप्पा जैसे नगरों के विनाश के पीछे यह अनुमान लगाते कि आर्य भारत में विदेशों से आये उनके आक्रमणों से यहाँ के मूलनिवासी व उनकी सभ्यता नस्ट हो गई जबकि मूल कारण नदियो का सूखना महामारियों का फैलना प्राकृतिक आपदाओं मे नगरों का मलुवे के ढेर मे दब जानाभी रहा है , कथित मूलनिवासियों की कोई प्रमाणिक पुस्तक संसार में नही है जिससे पता चलता हो कि आर्यों मे उन पर पांच हजार साल पहले आक्रमण किया । , पर आर्यों का बिपुल साहित्य मौजूद है , जिसमे वेद उपनिषद , ब्याकरण , कल्प , ब्राह्मण ग्रन्थ, रामायण महाभारत , गणित , क्रमिक विकास में अवतारवाद , मनुस्मृति , अर्थशास्त्र आयुर्वेद ब्राह्मण ग्रन्थ इसके अलावा संकल्प मे काल गणना की परम्परा तीर्थों मे तीर्थ पुरोहितों द्वारा संरक्षित बंशावलियां यह सब असाधारण है । कही भी नही लिखा गया है कि आर्यों ने मूलनिवासियों को कुचला विजय प्राप्त की किन्तु रामायण व महाभारत के ग्रन्थ यह सावित करते है कि आर्यो का आर्यो से ही युद्ध हुवे , जातीय भेदभाव का भी किसी ग्रन्थ मे उल्लेख नही है । इसके बावजूत भी समाज में यदि भेदभाव , जातिवाद है तो इसके पीछे ब्यावसाय का बटवारा , परम्परागत पूंजी का हस्तान्तरण व वाईरस जन्य विमारियों से बचाव का मनौनिज्ञान इसके कारणों मे शामिल है । इतिहास की पुस्तकों मे आर्यो की पहचान बताई गई कि वह गोरे होते है नाक लम्बी आँख भूरी होती है जबकि भारत के द्विजों मे काले गोरे का भेद नही है आर्यो के अराध्य नायक राम व कृष्ण तो काले ही है ।आर्यो की नस्ल का यही इतिहास आजाद भारत की किताबो मे भी छात्रों को पढाया जाता रहा ,जिसमें लिखा गया था किआर्य मध्य ऐशिया से भारत में आये आक्रान्ता थे, इसी मिथक को आधार बनाकर कहां जा रहा है , कि द्विजों(आर्यो) ब्राह्मण क्षत्रियों बनियों को देश छोंड़ देना चाहिये , कथित दलितों का कहना है कि आर्योने स्थानीय मूल निवासियों को गुलाम बनाया ।अब हम इन्हें गुलाम बनाईगे , दरअसल , दलित विमर्श की सरकारों द्वारा अनदेखी व दिये गये विशेषाधिकार ही इस बिमर्श के उत्साह का कारण है, सरकार का भी मूक व खुला समर्थन इन्हें प्राप्त हैं जब सुप्रिम कोर्ट ने कहा कि केवल आरोप के आधार पर किसी सवर्ण द्विज को जेल ना डाला जाय ऐसा आदेश पारित करने पर सड़को मे उतर आये दलित आन्दोलन के दबाव में सुप्रिम कोर्ट का आदेश ,उस समय मोदी सरकार नें रातों रात संसद मे कानून बनाकर बदल डाला व प्राविधान किये किआरोप लगाने पर ही एस सी एक्ट में द्विजों को जेल जाना ही होगा । बाद में उन्ही को यह सावित करना होंगा कि उन्होंने अभियोजन के प्रति जातिसूचक शब्द नही कहें ।उसके बाद तो यू ट्यूब चैनलों मे ब्राह्मणों के खिलाफत में जबरदस्त उछाल आया , कोई भी यू ट्यूबर खुलेआम यह कह सकता है कि उसे विवाह के लिये ब्राह्मण की वेटी चाहिये वह हिन्दु धर्म को ब्राह्मण धर्म कहने लगे । साल भर मे केवल दो तीन दिन अपने घर बुलाकर मामूली दक्षिणा तक ना देने वाला यह तबका कई बार यह कहते हुवे सुना जा सकता है कि ब्राह्मण उनकी भीख पर जिन्दा है , पर ब्राह्मणों की तरफ से कभी ऐसी प्रतिक्रिया नही आई जैसी प्रतिक्रिया जे एन यू में ब्राह्मण बनियों भारत छोंड़ो कैम्पेन के बाद आई है ।

भारत में सामाजिक वैमनस्य का दौर मैकाले की शिक्षा नीति के प्रभावी होने के बाद बड़ी तेजी से फैली है , महर्षि दयानन्द ने मैकाले के कुचक्र को समझ कर , भारत मे पुन: गुरुकुल व वेद के वैज्ञानिक महत्वों पर प्रकाश डा़लते हुवे कहा था कि हमे स्वाभिमान की रक्षा के लिये नेदिक धर्म की ओर लौटना होगा उन्होंने कहा कि वेदों मे कोई इतिहास नही है अपितु यह विज्ञान व आध्यात्म की पुस्तक है जिसमे सब सत्य विद्याये मौजूद है ।जो सर्वकाल मे सत्य ईश्वरीय ज्ञान है व अपौरुषेय.है , वेद उत्पत्ति पर महर्षी दयानन्द ने कहा कि इस ब्रह्माण्ड़ मे सब कुछ विद्यमान है आप्त पुरुषो को यह , ज्ञान व विज्ञान यही से प्राप्त होता है यह ज्ञान जो अपौरुषेय है , वह स्वभाविक भी है ,वेद सर्वकालिक है, इसी लिये वेद सृष्ठि के आरम्भ व प्रलय में भी बर्तमान ही होते इसकी खोज होती है । रिगवेद भाष्य भूमिका में उन्होंने इस तत्थ्य को उजागर किया है कि वेद ग्वालों के गीत नही अपितु विज्ञान के तत्थ्यों व आध्यात्मिक ऊचाईयों से भरे पड़े है ।.

महर्षि दयानन्द ने लिखा कि है कि हर युग का अन्त प्रलय से होता है सृष्ठि चार युगो तक चलती है , सृष्ठि व प्रलय प्रकृति की सिद्धान्त है ।, उन्होंने मोक्षमूलर , सायणाचार्य , महीधर , के वेद भाष्यों का खंण्ड़न करते हुवे कहा कि इनके द्वारा वेदों का जो भाष्य किया है वह वेद के ब्याकरण के अनुरूप नही है ,उन्होंने वेद के अष्ठाध्याई महाभाष्य ब्याकरण उपनिषद , ब्राह्मण ग्रन्थों का हवाला देते हुवे कहा , वेद मे इतिहास नही है ,आर्यों को बाहरी बताने वालो को कड़ा जबाब देते हुवे महर्षि दयानन्द ने कहा कि कि इस कल्प में आर्यों की उत्पत्ति का क्षेत्र कोई और स्थान नही अपितु हिमालय का तिब्बत है जहां से मानव दुनिया मे फैला है आर्यो का उत्पत्ति व ज्ञान विज्ञान का क्षेत्र भारत है अत: आर्य भारत के मूल निवासी है . मनुष्य के पलायन के साथ ही आर्यों ने दुनिया भर मे लोगों को सभ्य बनाया ।, ‘कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम् ” आर्य सभ्यता के चार स्तम्भ है , ब्राह्मण , क्षत्रिय वैश्य व शूद्र , इन दिनों आर्यों का जो चौथा वर्ण अपने को आर्य होंने में संन्देह कर रहा है , इस सन्देह को पुष्ट करने मे जे एन यू की कल्पित रिसर्च नम्बर वन पर है ।भारत मे जे एन यू रिसर्च करने का एक बड़ा केन्द्र है , इसमे विदेशी भाषाओ के साथ ही भारत की सामाजिक, राजनैतिक परम्परा पर पी एच डी होती है । आर्यो के बाहर से भारत मे प्रवेश की कहानी सर्वप्रथम जर्मन विद्वान मोक्षमूलर ने रची व दुनिया मे अंग्रेजो द्वारा प्रचारित की गई ं

आर्यो के विदेशी होने की कहानी व उनके प्रति जो घृणा फैलाई गई उसंमें वामपन्थी इतिहासकारों का एक धड़ा शामिल है ,जे एन यू की अधिकांश कल्पित रिसर्च इसके आधार है ,, हिटलर ने आर्य रैज का नाम लेकर ही सोवियत रूस पर आक्रमण किया था , यह भी आर्यो के प्रति बामपन्थी नफरत का कारण है , हिटलर आर्य था या नही यह स्पष्ठ नही पर हिटलर ने यहूदियों पर अत्याचार किये यह सत्य है । अमेरिकियों ने जापान के नाकाशाकी व हिरोसिमा शहरों पर जो परमाणु बम वर्षा की वह भी उस युग की बडी क्रूरता थी ।और सत्य घटना भी । द्वितीय विश्वृुद्ध का नायक व खलनायक कौन थे , इस पर केवल यही प्रचारित है कि हिटलर ही खलनायक था , पर इसी हिटलर ने सुभाष चन्द्र वोस को आजाद हिन्द फौज के गठन में सहयोग किया था हमारा देश आजाद भी हुवा । भलेहि यहुदियों के लिये हिटलर , जापानियों के लिये अमेरिका खलनायक हो पर भारत के लिये अंग्रेज ही खलनायक थे । दुर्भाग्य से अंग्रेजों के मानस पुत्र दलित जातियों की गरीबी व पिछड़ेपन की लिये साल भर मे अधिकतम् तीन चार दिन पूजा पाठ कराकर भीख स्वरूप दक्षिणा देने वाले दलित नेता इस पिछडडेपन लिये ब्राह्मणों जिम्मेदार ठहरा रहे है। नारा दे रहे है ब्राह्मणों भारत छोड़ो हद तो तब हो गई जब तमाम यू ट्यूब चैनलों में ब्राह्मणों के खिलाफ खूलेआम गालियां व नफरत फैलाने वालों के खिलाफ सरकार उसी तरह कार्यवाही नही करती जैसा कश्मीर में हुवा था । आश्चर्य की बात है कि क्षत्रिय इनके निशाने पर नही , क्षत्रियों को भी भिखमंगे ब्राह्मण ही उनकी गरीबी के लिये जिम्मेदार दिखते है। उन्हें भी शिकायत है कि हर एक क्षेत्र मे ब्राह्मणों को ही आगे क्यों दिखाया व बताया जाता है । आज यह माना जाने लगा है है कि पूरी जिन्दगी में साल भर में प्रतिवर्ष चार पाच दिन दक्षिणा देने वाले यह सोचने लगे है कि ब्राह्मणों ने उन्हें लूट लिया । जबकि ब्राह्मण इसी कारण पुरोहित्य कर्म छोड़ रहा है ।अब उसे देश छोडने की धमकी दी जा रही है । देश के पन्द्रह करोड़ ब्राहम्मण व इतमे ही बनिये दिस दिन देश छोड़ देंगे वे कहा जाईगे यह नारा देने वालो रो सोचना चाहिये ,क्या ये इतने भोले है कि कि देश छोड़ देंगे इस पर भी विचार होना चाहिये ,देश में किसे रहना है किले नही यह संविधान तय करेगा कोई जातीय समुह नही , सम्भवत; पीछे मुड़कर देखमे के बजाय आगे देखने की प्रबृति आयेगी ठीक उसी तरह जिस तरह तबाही के बाद समृद्धि आती है, क्योंकि रात्री के बाद दिन ही आता है ।

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