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संसार मे सुख व दुख का असल कारण भी प्रकृति ही है , यह प्रकृति समाज की चेतना से उक्पन्न होती है  तो कुछ हद तक यह प्राकृतिक भी है , स्वामी विवेकानन्द परिब्राजक कहते है कि संसार में सब प्रकार के जानवर व   मनुष्य भी  मिलते हैं। जनमें कुछ जानवर व मनुष्य  “सुख देते हैं, और कुछ  दुख  भी देते हैं। मनुष्य व प्रकृति मे  जो सुख देते हैं, वे ‘देवता’ कहलाते हैं। और जो दुख देते हैं, वे ‘राक्षस’ कहलाते हैं।”
क्या कभी आपने सोचा ऐसा क्यों है, कि कोई व्यक्ति दूसरों को सुख देता है, और कोई व्यक्ति दूसरों को दुख देता है। इसका कारण यह है, कि “सब लोगों के पूर्व जन्मों के संस्कार,  व प्रकृति का समावेश  इस जीवन मे भी होता है ,और वर्तमान के  वातावरण , परिवेश , से विचार  उससे बुद्धि और माता पिता के संस्कार व शिक्षा  माता पिता  का भोजन पारिवारिक वातावरण प्रशिक्षण आदि एक समान नहीं भिन्न -भिन्न  हैं ।” “जिसके ये सब कारण होते हैं,  , जिसका परिवेश अच्छा है ,वह दूसरों को सुख देता है, और वह ‘देवता’ कहलाता है। जिसके ये सब कारण खराब होते हैं, वह दूसरों को दुख देता है, और वही मनुषिय सिवरूप मे  ‘राक्षस’ कहलाता है।”
यदि आप संसार में सुख प्राप्त करना चाहते हैं, और दुखों से बचना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको पुरुषार्थ करना होगा। “संसार में रहने वाले देवताओं और राक्षसों को पहचानना होगा।” “देवताओं के पंख नहीं होते, और राक्षसों के सींग नहीं होते, जिससे कि वे देखते ही पहचान लिए जाएं।” ऊपर से देखने में सब मनुष्य एक जैसे दिखते हैं। कौन देवता है, और कौन राक्षस, यह तो उसके आचरण व्यवहार से पता चलता है। और इस बात की पहचान करना ‘आपका’ कर्तव्य है। “इसलिए किसी व्यक्ति के बाहरी रूपाकार को देखकर उसे देवता न समझ लें, या राक्षस भी न समझें। जब तक आप उससे थोड़ा व्यवहार नहीं कर लेंगे, तब तक आप ठीक प्रकार से निर्णय नहीं कर पाएंगे, कि यह व्यक्ति देवता है, या राक्षस?” “लोगों के साथ थोड़ा थोड़ा व्यवहार करें और फिर ऊपर बताए लक्षणों के अनुसार उनकी पहचान करें। धीरे-धीरे आपको पता चल जाएगा, कि कौन देवता है, और कौन राक्षस?”
“देवताओं के साथ मिलजुल कर रहें, और राक्षसों से बचकर रहें, तभी आप जीवन में सुखी रह पाएंगे, तथा दुखों से छूट पाएंगे।

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