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लोकतन्त्र का प्रमुख आधार मतदाता व उनके द्वारा किया गया मतदान है ,देश मे मत प्राप्त करने के लिये यदि मुद्दे ना हो तो जनता को समुहों में  बाँट कर मत पाये जा सकते है , देश मे लोकतन्त्र का आधार अब काफी हद तक इन्हीं  समुहों के हाथों मे  है ,। इन दिनों कई जातिवादी नेता अपनी- अपनी जातियों के  नाम पर राजनीति करते हुवे देखे जा सकते है ।

बात उन दिनो की है जब देश मे जनता दल नामक राजनैतिक पार्टी बनी थी  विश्वनाथ प्रताप सिंह की देश मे सरकार  बनी थी , बी पी सिह ने काग्रेस सरकार द्वारा गठित मंण्डल आयोग की सिफारिशों को देश मे लागू करने की घोषणा की , देश समर्थकों व बिरोधियों मे बँट गया , उस समय देश एक प्रकार से बहुसंख्यक समाज में  विभाजन  का गवाह  बना । कई लोगों ने  जस्न मनाया तो कई लोगों ने बिरोध में आत्मदाह किया। तब से देश के हिन्दीभाषी राज्यों में मण्डल व कालान्तर मे कमण्डल  समर्थक पार्टियों का उदय हुवा वे आज भी कई राज्यों मे क्षेत्रीय पार्टियों के रूप मेया फिर बी जे पी के रूप मे राजनीति मे  मौजूद है क्षेत्रीय.दलों मे , जिसमे  सपा , आर जे डी , जनता दल सेकुलर आदि पार्टिया मौजूद है ,।तो राष्ट्रीय.दल के रूप मे .इनकी काट के लिये बी जे पी  मौजूद है बी जे पी का राम मन्दिर आन्दोलन हुवा जिसे कमण्डल आन्दोलन कहा गया ,यह  मण्डल पर भारी पड़ा। देश मे इसी कमण्डल के बलबूते पर अटल बिहारी बाजपेयी  के नेतृत्व मे  बी जे पी की  पहली सरकार तेरह दिन व दूसरी पूरे पाँच साल चली । हालांकि उद्योग पतियों के एक समुह ने काग्रेस का साथ दिया जिसमे फिर से एक ऐसी सरकार बनाई जिसमे मण्डल व कमण्डल  हासिये पर चले गये , पर राममन्दिर आन्दोलन ने बी जे पी को फिर से जीवन दान दिया  पिछले दस वर्षों से बी जे पी की सरकार है  ।जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमन्त्री पद के रूप मे उम्मीदवार घोषित हुवे  तब राम मन्दिर के साथ ही गुजरात माडल की बड़ी धूम रही मोदी देश मे एक बड़े नेता के रूप मे  उभरे ।.

यदि देखा जाय तो मण्डल कंमण्डल की राजनीति  ने  देश की  राजनीति को विकास के मुद्दे से दूर कर दिया , । इस समय देश मे हिन्दुत्व  की राजनीति की काट के रूप मे काग्रेस जातीय जनगणना को लाई है , ।.यदि देश में  जातीय.जनगणना के आंकड़े सामने आये तो फिर संख्याबल में सर्वाधिक संख्या वाली जाति को  लाभ देने की प्रथा चल पड़ेगी ,। देश मे अन्य मुद्दे भी है जिसंमे बेरोजगारी महंगाई शामिल है सत्ताधारी व बिपक्षी दल क्या रणनीति अपनाते है यह ज्यों -ज्यों चुनाव प्रचार जोर पकडेगा त्यो -त्यों स्पष्ठ होता जायेगा । देखना होगा लोकतन्त्र का तारणहार मतदाता  क्या फैसला देता है ।

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