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लोकसभा चुनावों की उल्टी गिनती शुरु हो गई है पर भनिष्य के मुद्दे अभी नदारत है , । मोदी सरकार ने पुन: लोकसभा मे चार सौ पार का नारा देकर अपना लक्ष्य निर्धारित कर दिया है पर जिस प्रकार मतदाताओं ने खामोशी अख्तियार कर ली है वह सरकार के प्रति संन्तुष्ठि है या असहमति यह जानना इस बार के चुनाव मे आसान नही है चुनाव के आरम्भ मे , जिस प्रकार होलिकोत्सव आया इसमे होलियारों ने भी अपना सन्तोष या असन्तोष  अपने गीतो के माध्यम से  ब्यक्त नही किये , यद्यपि अभी चुनावो के नामांकन ही  हो रहे है ।

राजनैतिक दलों के चाडक्य भी यह समझने का प्रयास कर रहे है कि आखिर इस बार मतदाताओं को अपने पक्ष मे कैसे मोड़ा जाय , यदि उम्मीदवारों की बात करे तो कोई भी उम्मीदवार अपने दम पर चुनाव नही लड़ रहा , बल्कि  सभी केन्द्रिय नेतृत्व के आश्रय होकर चुनाव लड़ रहे है  ऐसे मे स्थानीय मुद्दे नदारत ही रह जाय तो आश्चर्य नही है ।, इस बार भी चुनाव के महानायक या तो  प्रधानम्नत्री नरेन्द्र मोदी है या फिर राहुल गांधी , अन्य.दल इण्ड़िया   या एन डी ए गठबन्धन का हिस्सा है । बी जे पी  मे अपने सहयोगियों के साथ सीटों मे तालमेल बिठा लिया है वही इण्ड़िया गठबन्धन की तस्बीर नामांकन के अन्तिम दिन ही तय हो पायेगी , । मीड़िया का भी मुद्दों पर जोर नही है ,सबसे बड़ा मुद्दा अब भी सामप्रदायिकता है, जो अल्पसंख्यक या बहुसंख्यकवाद के बीच झूल रही है ।.

यदि उत्तराखण्ड़ की बात करे तो यहा  सबसे बड़ा मुद्दा पलायन, उजडती  खेती बन्दरों का आतंक , गावों मे रोजगार के अवसरो का लोप है , पर सरकार के मुद्दें घर -घर नल , मुफ्त राशन , बृद्धावस्था पेन्शन , लाभार्थी सम्पर्क , ग्राम सड़क आदि आदि है । इस बीच बिद्युत बिलों मे हुई बृद्धि भी एक मुद्दा बन सकता है , सरकार मे गैस सलैन्डरों मे आशिक रूप से मूल्य घटाया है पर वस्तुओं के माल भाड़े  मे बृद्घि एक समस्या है मतदाता इस पर क्या राय रखेंगे यह मतदान से ही स्पष्ठ होगा किसान पैन्सन भी सरकार की ओर से मतदाताओं को लुभाने की एक महत्वपूर्ण कोशिस है , हाल मे ही श्रम योजना के तहत मजदूरो को भी जो लाभ दिये गये है उसका लाभ भी सरकार लेने की कोशिस कर रही है इस पर   बिपक्ष  की राय व उसके द्वारा की गई रणनैतिक योजना  पर निर्भर है  कि सरकार इसे अपने पक्ष मे कितना मोड़ पाती है ।

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