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वेद स्वाध्याय

सामवेद मंत्र ९६९ में परमात्मा के उपकारों का वर्णन है। मंत्र निम्न है।

स हि ष्मा जरितृभ्य आ वाजं गोमन्तमिन्वति।
पवमान: सहस्त्रिणम्।।

मंत्र का पदार्थ सामवेद भाष्यकार वेदमूर्ति आचार्य (डॉ०) रामनाथ वेदालंकार जी भाष्य के अनुसार – चित्त और आत्मा की शुद्धि करने वाला वह सोम अर्थात् जगत को उत्पन्न करने वाला परमेश्वर स्तोताओं के लिए हजार संख्या वाले, प्रशस्त गाय, प्रशस्त वाणी आदि से युक्त धन को, अथवा अंत:प्रकाशयुक्त आत्मबल को प्राप्त कराता है।

भावार्थ:- प्रेय मार्ग का और श्रेय मार्ग का अवलम्बन करने वाले लोगों से ध्यान किया हुआ परमेश्वर उन्हें मनोवांछित सब श्रेय और प्रेय प्रदान कर देता है।

सामवेद मंत्र ९७० में परमात्मा से प्रार्थना की गई है। मंत्र निम्न है।

परि विश्वानि चेतसा मृज्यसे पवसे मती।
स न: सोम श्रवो विद:।। हे परमात्मन्! सब सांसारिक भोगविलास आदि को छोड़कर, आप ही हमारे द्वारा चित्त से और मति से अलंकृत किए जा रहे हो, क्योंकि आप हमें पवित्र करते हो। हे परमैश्वर्यशालिन्! वह आप हमें यश प्राप्त कराओ।

भावार्थ:- जब मनुष्य बाह्य विषयों से मन को हटाकर और उसे परमात्मा में ही केन्द्रित करके परमात्मा का ध्यान करता है तब वह परमात्मा उस मनुष्य को अत्यधिक पवित्रता और अविनश्वर यश प्रदान करता है।

सामवेद मंत्र ९७१ में परमात्मा से प्रार्थना है। मंत्र निम्न है।

अभ्यर्ष बृहद्यशो मघवद्भ्यो ध्रुवं रयिम्।
इषं स्तोतृभ्य आ भर।

हे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता परमैश्वर्यशाली परमेश्वर! आप दानी धनियों को स्थिर धन, और महान् कीर्ति प्राप्त कराओ। और उपासकों के लिए विज्ञान तथा इष्ट सुख लाओ।

भावार्थ:- दानशील लोग ही धनप्राप्ति के अधिकारी होते हैं। और जो परमात्मा की उपासना करते हैं वह विवेकी तथा सुखी होते हैं।

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