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बागेश्वर  जनपद के अन्तर्गत कौसानी में पर्वतीय विकास की सही अवधारणा विषय पर  तीन दिवसीय संगोष्ठी के दूसरे दिन , पर्वतीय विरास की सही अवधारणा पर विचार मंथन हुवा , इस संगोष्ठी , में  उत्तराखण्ड के सामाजिक तानेबाने  में समाज के विभिन्न समुदायो की स्थति पर चर्चा हुई ।  पूर्व सासद प्रदीप टम्टा ने  कहा कि पहाड़ों की तमाम तरह की समस्याओं के   मध्य में हिमालय है यह हिमालय   भारतीय उप महाद्वीप का आधार स्तम्भ है , आज की बड़ी समस्या यह है कि हिमालयी राज्यों का आपस मे संवाद नही है । ना ही यह बहस का मुद्दा बन पाया । हिमालय मे जल जंगल व जमीन का मुद्दा हासिये पर है ,यदि वन आन्दोलन नी हुवा होता को भारत बन संरक्षण अधिनियम् भी नही बन पाता , इस कानून के बनने से ही  हिमालय की  जमीन बच पाई है , आने वाले दिनों मे खेती की जमीन पर भी संकट है । छोटे से राज्य मे आय के स्रोत भी जल जंगल व जमीन है , पर बड़े बाध इसका बिकल्प नही है । अब दुनिया मे बड़े बाध नही बन रहे है , । अब उन देशों में बड़े बांधों को तोड़ा जा रहा है । इस हिमालयी राज्य के लिये नये दृष्टिकोण की जरूरत है , । जब युरोप भी पहाड़ी ईलाका है तो वहां लैण्ड स्लाईड नही हो रहा , । अत: यह जरूरी है कि नये तरीके से सोचना होगा । सरकारों के भीतर दो धनवान विभाग है , वही प्रभावित करते है ।.जो विकास का माडल  पहाड मे थमाये  जा रहे है वह ब्यावहारिक  नही है । भ्रूण हत्याओ के  कारण लिगांनुपात गिर गया है । यदि महिलाये नही होंगी तो मां कहां से होगी । उत्तराखण्ड बनने के बाद , अधिकारियों ने पहाड़ मे बैठना छोड दिया है । गैरसैण पहाड,की एक अवधारणा है ।

   देश में इतिहास  पर बड़ी बहस है । इस समय.पन्थ निरिपेक्ष्यता पर बहस नही है , उत्तराखण्ड मे हुड़के का इतिहास , नृत्य संगीत  व परम्पराओं के इतिहास पर भी लिखे जाने की जरूरत है । मन्दिर मस्जिद मे जाने पर आपक्ति नही होनी चाहिये ,

इस संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार , राजीव लोचन साह , पद्मश्री शेखर पाठक , बिजय जडधारी , इन्द्रेश मैखुरी , पी , सी तिवारी , प्रभात ध्यानी , तरुण जोशी , भुवन पाठक , चारु तिवारी आदि लोग शामिल है ।

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