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“ नशा एक अभिशाप है ”
: चन्दन घुघत्याल
मेँ जब कक्षा दस में पढता था तो हमारे इलाके का माहौल बहुत ज्यादा मोटिवेशनल नहीं था, इलाके में ऐसा कोई ब्यक्ति नहीं था जो बच्चों को अच्छी सीख दे सके। हम १०-१२ लोग रोज पैदल ही ६-७ किलोमीटर दूर इण्टर कॉलेज में पढ़ने जाते थे। हमारे कई साथी रोज ८ बजे घर से निकलकर पास के जंगल में दिनभर छिप जाते थे और शाम को ३-४ बजे घर आ जाते थे। शायद उन्हें ऐसा करने में मजा आता होगा। इनमे से कई छात्र भांग के पेड़ों से चरस निकालकर बीड़ी में भरकर उसका सुट्टा लगाकर मस्त हो जाते थे। दिनभर आनंदमय रहने का विचारकर और धूप सेंक कर शाम को घर आ जाते थे ? आखिर वे सभी ऐसा क्यों करते होंगे ? वे बच्चे कभी अपने माँ बाप के बारे मेँ नहीं सोचते होंगे क्या ? इनमे से कई तो हाई स्कूल भी नहीं कर पाए। क्या यह उस स्कूल की भी नैतिक जिम्मेदारी नहीं थी कि वे उन बच्चों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यबाही करता, जो महीनों विद्यालय से गायब रहते थे? यह हाल उस दौर मेँ ज्यादातर विद्यालयों का था। उन दिनों हाई स्कूल और इण्टर का रिजल्ट ग्रामीण क्षेत्रों मेँ २० -३० प्रतिशत तक ही रहता था। आज जब सोचता हूँ कि यह डिवाइन डेस्टिनी ही होगी कि में और मेरे एकाध साथी उस माहौल मेँ नशे से कैसे बच गए होंगे। अन्य साथियों को ऐसी कुबुद्धि क्यों आयी होगी ? काश कोई प्रभावशाली ब्यक्ति इन सभीको मोटीवेट कर पाता तो शायद वे भी नशे की तरफ नहीं जाते। यह नशा ब्यक्ति विशेष के साथ परिवार और समाज को भी बर्बाद कर देता है। आने वाली पीढ़ियां भी नशे के कारण बर्बाद हो जाती हैं। यह गनीमत थी कि उनदिनों गांजा और चरस का ही नशा ग्रामीण क्षेत्रों मेँ था, यदि आज की तरह के महंगे नशे होते तो न जाने समाज की दशा क्या होती ? आज तो हर स्कूल, जिम और खेल मैदान के आस पास नशा करने और करवाने वाले एजेंट मिल ही जायँगे जो कि नए नए बच्चों को अपने जाल मेँ फंसाने के लिए तरह तरह के प्रपंच करते हैं। यह हाल पूरे भारतवर्ष मेँ है और बच्चे नशे की गिरफ्त मेँ आसानी से आ जा रहे हैं। हमें ठोस कदम उठाते हुवे अपने बच्चों को नशे से बचाना होगा।
आज की भागमभाग भरी जिंदगी में मानवीय संवेदनाओं में कमी आयी है। जिसकी वजह से आपसी सौहार्द कम हुवा है, सतही और खोखले रिश्तों की वजह से आपसी विश्वास में कमी आयी है। संयुक्त परिवारों में कमी, बाजारवाद और पाश्चात्य संस्कृति का अत्यधिक प्रभाव तथा नैतिक शिक्षा में कमी की वजह से बच्चे, जवान , बूढ़े आसानी से पथ विचलित हो जा रहे हैं। इसी की वजह से कई बुरी आदतें अपना प्रभाव बच्चों पर छोड़ रही हैं। नशे का सेवन इन बुराईयों में से एक है जो कि हर आयुवर्ग के लोगों को अपनी गिरफ्त में जकड़ रहा है।
लत यानी एडिक्शन किसी भी चीज की हो सकती है जैसे हम जैसे लोग काफी चाय पीते हैं , कई बच्चे विडिओ गेम बहुत ज्यादा खेलते हैं , आजकल कई एडल्ट भी तो घंटों फेसबुक या यू ट्यूब वीडियो देखते हैं, यह सभी चीजें लत कहलाती हैं। इन सभी लतों से आदमी की सृजनात्मक्त का ह्रास होता है। मानसिक और शारीरक शक्ति में कमी तो आती ही है अपितु आर्थिक संशाधनों में भी कमी होती है। धूम्रपान, शराब और नशे के आदी हो गए लगों में तो यह लत ऐसी घर कर जाती है कि ब्यक्ति की सोचने समझने की शक्ति भी क्षीण हो जाती है। किसी भी लत को ब्यक्ति विशेष छोड़ना तो चाहता है लेकिन वह लत के आगे नत मस्तक सा हो जाता है क्योकि यह लत उसे अपना गुलाम बना देती है। किसी भी लत या आदी हो जाने के क्या कारण हो सकते हैं ? किसी भी नशे का पहला प्रभाव हमारे दिमाग पर पढता है। हमारे दिमाग में एक सर्किट होता है, जिसे रिवार्ड पाथवे कहते हैं। जब दिमाग उत्तेजित होता है तो यह डोपामाइन नाम का कैमिकल छोड़ता है। डोपामाइन रिलीज होने पर व्यक्ति को आनंद की अनुभूति होती है। सभी नशे इतने खतरनाक होते हैं कि इनके उत्पाद दिमाग पर ऐसा असर दिखाते हैं कि लोग जल्दी ही नशे के आदी हो जाते हैं। डोपामाइन एक ऐसा कैमिकल है जो दिमाग को कई अच्‍छी चीजें करने के लिए प्रेरित करता हैं। जब ब्रेन में बड़ी संख्‍या में डोपामाइन कैमिकल रिलीज होता है तो कई सकारात्‍मक भावनाएं जैसे नव ऊर्जा, नव प्रेरणा, गुद गुदी यादें, खुशी और सुकून आदि मन में पैदा होते हैं और ब्यक्ति नेचुरल खुश रहता है। जब डोपामाइन कम रिलीज़ होता है तो मन निराश रहता है, ऐसे में किसी भी प्रकार के नशे या ड्रग्स के सेवन से डोपामाइन रिलीज़ होता है और ब्यक्ति नशे का आदी हो जाता है। यही से वह इन बाहरी तत्वों का दास बनने लग जाता है। स्वाभाविक ख़ुशी के बजाय चाय , कॉफी , धूम्रपान, शराब, नशा या फिर कोई और आर्टिफीसियल चीजो के द्वारा डोपामाइन उत्प्रेरित करता है और इनके फांस में जकड़ जाता है। यही से अत्यधिक लत उसके सोचने समझने की शक्ति को कम कर देता है।
हमारे समाज में शराब, सिगरेट, तंबाकू का सेवन आजकल बहुत आम सा हो गया है, लेकिन इसके अलावा भी लोग अलग अलग तरह के नशे करते हैं, जिनमे शराब, अफीम, चरस, गांजा (भांग), हेरोइन व कोकेन जैसे घातक नशीले पदार्थ शामिल है। कुछ लोग खांसी के सिरप, आयोडेक्स और कुछ निद्रकारक गोलियों का इस्तेमाल नशे के रूप में करते हैं। इसके अलावा भी लोगो ने नशा करने के अलग अलग तरीके खोज रखे हैं जैसे कोई पेट्रोल सूंघकर नशा करता है, कोई थिनर सूंघ कर तो कोई सिलोचन (टायर पंचर जोडऩे वाला) से नशा करता है। यह बहुत ही भयावह है कि आठ से बारह साल के बच्चे इस नशे की गिरफ्त में आ गए हैं। नशे के लिए यह बच्चे कुछ भी करने को तैयार रहते है। जिस उम्र में इन बच्चों के हाथों में कॉपी और किताब होनी चाहिए, उस उम्र में इनके हाथों में व्हाइटनर, सिलोचन और आयोडेक्स की शीशी नजर आती है।
जब भी मैं नशे और जुवे की लत के कुप्रभाव की बात करता हूँ तो मुझे अपने क्षेत्र के परुवा के परिवार की याद आ जाती है। परुवा का परिवार गांव के बाक़ी परिवारों से बहुत ही धनाढ्य परिवार था , धनाढ्य का मतलब उन दिनों खेती बाढ़ी, जेवर और बड़े बड़े काँसे, ताम्बे और पीतल के बर्तनों वाले परिवार को कहते थे। परुवा के पास सब कुछ था, भाबरी बैल, हरिवाणावी भैंस, आदि उसके चौखट की शान बढ़ाते थे। पता नही कैसे परुवा को जुवे और शराब की लत पढ़ गयी। नशे और जुवे की ऐसी लत पड़ी कि उसने बर्तन, जेवर खेत खलिहान सभी बेच दिए और शीघ्र ही अकाल मृत्यु की गोद मेँ समां गया। यह लत इतनी खतरनाक होती है कि ब्यक्ति अपने बच्चों और परिवार के बारे मेँ नहीं सोचता है। परुवा के बच्चों ने दर दर की ठोकरें खाकर बढ़ी मुश्किल से अपनों को संभाला है। नशे के कारोबारी धनवान या कमाने वाले को तो फंसाते ही हैं साथ ही गरीब तबके के बच्चों को भी नशे का गुलाम बनाकर उन्हें ड्रग पैडलर बनाते हैं।
किसी व्यक्ति के नशे के आदी होने के पीछे कई कारण होते हैं जैसे कि उस ब्यक्ति विशेष की अपब्रिंगिंग, उसकी आनुवंशिकता (जीन), लिंग, जातीयता, और उसका सामाजिक परिवेश। नशे की लत एक क्रॉनिक, बार-बार रिपीट हो जाने वाली बीमारी है। इससे दिमाग में लंबे समय तक चलने वाले कैमिकल बदलाव होते हैं, जो नशे की लत को छूटने नहीं देते। मै जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे अपने आस पास की कई छोटी छोटी घटनाएं याद आती हैं। बढे बूढ़े गांव के जब हुक्का या बीड़ी पीते थे तो वह आस पास के बच्चों को हुक्का या बीड़ी पीने के लिए जाने अनजाने प्रेरित सा कर देते थे। मैंने कई बच्चों को उनके द्वारा फेंकी बीड़ी के टुकड़ों को शौक शौक में सुट्टा लगाते हुवे पाया। इनमे से कई को उनके अभिभावकों ने मार पीटकर इस बुरी आदत के घेरे में आने से रोका तो कई बेलगाम ऐसे हुवे कि बाद में चिलमबाज भी बन गए। शौक शौक में फेंकी गयी बीड़ी के टुकड़ों से शुरू हुई यह दुर्गति यात्रा कई में शराब की आदत डाल गयी। ऐसे ही आसपास घटने वाली कई सच्ची घटनाएं हैं जिनको देखकर मन दुखी हो जाता है परन्तु इन घटनाओं का सच्चा चित्रण करने से आने वाली नशा रूपी महा बिपत्ति से कई को बचाया जा सकता है, क्योंकि इन नशेड़ियों की असफल कहानियों से कई नशे के शौक़ीन अपना जीवन और अपने बच्चों का जीवन तो बचा पाएंगे। यह मेरा दृढ विश्वास है कि जनजागरण से ही नशा और नशेबाजों से बचा जा सकता है।
नशे के शिकार हुवे अनगिनत परिवारों की कहानियाँ दिल दहला देती हैं। शेरू पढ़ाई मेँ बहुत ही अच्छा था , उसके पिता जी दिल्ली मेँ किसी गेस्ट हाउस मेँ काम करते थे और वह अपनी माँ और बहिन के साथ गांव मेँ रहता था। बारहवी करने के बाद पिता जी के पास दिल्ली गया और किसी कंपनी मेँ ऑफिस बॉय के रूप मेँ काम करने लग गया। उसकी दोस्ती खोड़ा निवासी संजय और बीरु से हो गयी। ऑफिस के बाद शाम को वे रोज पार्टी करते थे। खाना खाओ या नहीं लेकिन पीना जरुरी करने लगे। पीने के साथ साथ गांजा, चरस और अन्य नशा भी करने लगे। शेरू को नौकरी से हाथ धोना पढ़ा। पिता जी और अन्य रिश्तेदारों ने शेरू को सँभालने की बहुत कोशिस की, लेकिन वह तो ड्रग एडिक्ट हो गया था। हिम्मत हार कर उसको गांव मेँ छोड़ आये। वहां भी वह नशे के लिए केरोसीन तेल और शराब पीने लगा। नशे के लिए मार पीट भी करने लगा। बिना खाये पीये केवल नशा करने से उसकी भी अकाल मृत्यु हो गयी और वह अपने पीछे अपने परिजनों को ग़मगीन हालत मेँ छोड़ गया। निम्न और मध्यम श्रेणी परिवारों मेँ माँ बाप को बच्चों से यही आशा होती है कि पढ़लिखकर बच्चे परिवार की आर्थिक दशा सुधारेंगे, लेकिन नशे की लत परिवारों को कंगाल बना देती है।
नशे के खिलाफ जन जागृति के लिए आर्य समाज मंदिर, गायत्री परिवार, चिन्मय मिशन, राम कृष्ण मिशन आदि जैसे संघटन समय समय पर जागरूकता अभियान चलाते हैं। इन संघटनों से जुड़े लोग स्वयं निरब्यसनी होते हैं और समाज को भी निरब्यसनी बनाना चाहते हैं। देश विदेश मेँ कई सामाजिक और जन सरोकारों की बातें करने वाले संघटन मानते हैं कि सरकारों को सबसे ज्यादा राज्सव (रेवेन्यू) शराब जैसे ब्यवसाय से मिलता है तो सरकारें क्यों चाहेंगी कि लोग शराब और अन्य नशा न करें। इतिहास गवाह है इसीलिए शराब और नशे के खिलाफ जनांदोलन हुवे। उत्तराखंड मेँ भी १९८४ मेँ सरकार की गलत शराब नीति के खिलाफ उत्तराखंड जन संघर्षवाहिनी के नेतृत्व मेँ नशा नही रोजगार दो आन्दोलन चला, पूरे उत्तराखंड मेँ इस आंदोलन ने शराब माफिया की चूलें हिला दी थी और गांव गांव मेँ महिलाओं, और बच्चों ने भी बढ़ चढ़ कर भाग लेकर शराबियों को बिच्छू घास लगाकर शराब न पीने की सौगंध दिलाइ और नशे का कारोबार करने वालों का मुँह कालाकर नशा न बेचने को मजबूर किया। कई सालों तक इस आंदोलन का प्रभाव रहा और लोग शराब पीने से डरने लग गए थे। आज उत्तराखंड को विशेषकर इस नशे के खिलाफ खड़े होने की नितांत आवश्यकता है। नशा नहीं अच्छी शिक्षा दो, चौबीसों घंटे बिजली दो, नशा नही अच्छी स्वाश्य सुविधा दो, ठेके नहीं अच्छी सड़क दो आदि जैसे जन जागरण की आवश्यकता है। खैर १९८४ और १९९४ के महा आंदोलनों ने उत्तराखंड को जागृति किया लेकिन जन आंदोलन करने वालों को हासिये मेँ धकेलने के कारण अब शायद ही कोई बढ़ा आंदोलन हो पायेगा। भले ही जानानंदोलनकारी अपने स्तर पर समाज को जागरूक कर रहे है और लोक नियंताओं की गलत नीतियो से समाज का ग्वाला भी कर रहे हैं।
नशा करने वाले कई भयंकर दुर्घटना के शिकार हुवे हैं, कई को सांप ने डस दिया तो कई पहाड़ से गिरकर या नदी मेँ डूबकर काल का ग्रास बने। अभी हाल ही मेँ रानीखेत के पास राजन नाम के ब्यक्ति की मौत तेंदुवे के आक्रमण से हुई। राजन भी बी ए करने के बाद महानगर मेँ नौकरी करने गया, छोटी मोटी नौकरी कर गुजारा तो करने लगा लेकिन दिल्ली में वह नशेड़ियों की संगत में पड़ गया। जो भी वह कमाता था नशे में फूंक देता था। थकहार कर माँ के पास गांव इस आशा मेँ लौटा कि बूढ़ी माँ को कुछ सहारा दे सके और नशे से बच सके। लेकिन नशे का आदी हो चुका राजन नशा नहीं छोड़ पाया और नशे की खोज में रोज मार्किट जाता और अपने नशे का इंतजाम कर ही लेता था। नशे की हालत में वह अकेले पहाड़ का रास्ता तय करता और देर रात घर लौटकर बूढ़ी माँ से खाना मांगता था। ममतामयी माँ खाना परोसकर उसे समझती थी। तेंदुवे के खतरे से उसे सावधान रहने को कहती। लेकिन राजन की विवेक शीलता तो मानों ख़त्म हो गयी थी। एक दिन रात भर वह घर नहीं लौटा तो माँ ने आसपड़ोस के लोगों से राजन का पता लगाने को कहा। दूसरे दिन जंगल में रस्ते से दूर झाड़ियों में उसकी आधी खायी लाश मिली। बूढ़ी माँ अपने राजन की इस दर्दभरी मौत पर मातम मचाती रही, शायद यही उसकी नियति रही होगी।
यदि किसी बच्चे में नशे की प्रबृति हो भी जाती है तो हमें उसका तिरस्कार नहीं करना चाहिए बल्कि उसके प्रति अपनापन और प्यार दर्शना चाहिए। उसको सामाजिक कार्यों में इंगेज करना चाहिए ताकि वह अपना अनादर और अपने को आइसोलेशन में न समझे। ऎसी ही एक कहानी है संतोष की, जो कि ऊटी के एक बोर्डिंग स्कूल में पढता था। शौक शौक में इ सिगरेट (वैपिंग) का आदी हो गया था, स्कूल वाले भी उसकी हरकतों से परेशान हो गए थे और उसको स्कूल से घर भेज दिया गया। उसके माँ बाप ने उसके साथ एक दोस्त की तरह का ब्यवहार किया और उसके नशे की आदत और नशे के प्रकार के बारे में जानाकरी हाशिल की। उन्होंने स्वयं उसका भरपूर मार्गदर्शन किया, उसको अच्छे दोस्त और ख़राब दोस्तों के बीच के अंतर को समझाया। संतोष को पीयर प्रेशर से भी बहार आने के लिए यह सलाह दी कि किसी से वह अपनी तुलना न करे। संतोष बहुत खुश था कि उसके माँ बाप ने उसको समझा। वापिस अपने हॉस्टल लौटकर उसने अपने अध्यापकों और सहपाठियों के दिल जीता। उसने खेलकूद में खूब भाग लिया और मन लगाकर पढ़ाई की। कक्षा बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में वह ९५ प्रतिशत अंक लाया।
हमारी सरकारों में कभी कभी ऐसे लोग, लोक नियंता बन जाते हैं जिन्हें सामाजिक सरोकारों से कोई मतलब नहीं होता है। दिल्ली सरकार की शराब नीति का दुष्परिणाम सर्व विदित हैं। उत्तराखंड में प्रस्तावित शराब नीति तो मानो देवभूमि के घर घर को बार में तब्दील करने वाली थी। इस नीति के अनुसार किसी भी उत्तराखंड निवासी को अपने घर में 50 लीटर तक शराब रखने का अधिकार मिल गया था जिसके लिए एक लाइसेंस उत्तराखंड सरकार से लेना प्रस्तावित था। धन्य हो महिला मंच जैसे जागरूक संघटन की जिन्होंने विरोध किया तो सरकार ने बहुत ही अच्छा निर्णय लेकर इस नीति को ही स्थगित कर दिया। हमें वास्तव में शराब, नशा , जुवा और अन्य समाज विरोधी गतिविधियों से खुद को बचाते हुवे अपने परिवेश को भी बचाना है। एक अच्छा परिवेश विकसित मानसिकता को जन्मेगा।
भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने २०२०-२१ मेँ नशा मुक्त भारत अभियान चलाया था। मंत्रालय द्वारा यह एक सही पहल थी और यह सच है कि नशा मुक्त भारत ही सुदृढ़ भारत का निर्माण करेगा। इस पहल को प्रभावी ढंग से एक मिशन क़ी भांति चलाये जाने क़ी नितांत आवश्यकता है। नशे के खिलाफ समाज मेँ सक्रिय सभी संस्थाएं एक जुटता के साथ काम करेंगी और भारत सरकार नशे के खिलाफ कानून को सख्ती से लागू करेगी तो अवश्य हमारे सभी नौनिहालों का भविष्य सुनहरा होगा।

नशे का करो प्रतिकार, बचाओ अपना घर संसार।
नशा एक अभिशाप है, न मिटने वाला महा पाप है।।
नशे का करो प्रतिकार, मचाती है नशा, हाहाकार।
नशा एक षड़यंत्र है, समाजविरोधियों का यन्त्र है।।
नाग का फन सा तंत्र है, बनाती गुलाम व परतंत्र है ।
नशा एक अभिशाप है, यह न मिटने वाला श्राप है।।
: चन्दन घुघत्याल

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