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घटना उन दिनों की है जब भारत गुलाम था अतीत में पूरी दुनिया को वस्त्र का निर्यात करने वाला भारत अंग्रेजों की नीतियों से एक दम खोखला हो चुका था, अंग्रेजों ने  भारत के कौशल पर प्रहार किया , हजारों कारीगर बेकार हो गये , भारत  को कच्चे माल की मंण्डी बनाकर रख दिया था ।  शिल्पकार बेरोजगार होकर अत्यधिक दयनीय हो गये थे ।

  एक दिन  की बात है स्वामी दयानन्द एक नदी के किनारे समाधिस्थ थे रात्री का समय था  उस काली रात्री के  समय एक महिला अपने बच्चे के शव को लेकर नदी के तट पर आई।  महिला ने अपने बच्चे के शव को नदी में प्रवाहित किया , उसे पता ही नही था कि कोई उसे  देख रहा, सच में कोई देख भी नही रहा था , यदि वह   अपने बच्चे के शव को नदी मे प्रवाहित करते समय जोर से नही चिल्लाती तो स्वामी जी की समाधि नही टूटती पर वह  जोर से करुण क्रन्दन करने लगी ,महिला की चीत्कार से ऋषि दयानन्द की समाधि टूट गई  महर्षि को लगा कि  की भारत की दुर्दशा उन्हें ललकार रही है । उन्होंने देखा की महिला ने एक  शव को नदी के जल में प्रवाहित किया है और शव के कफन को उतार लिया है। महर्षी ने देखा कि ये कफन का टुकड़ा उसी साड़ी का आधा हिस्सा था जो उस महिला ने पहन रखा था, क्योंकि उसके पास तन ढ़कने को दूसरा कपड़ा न था सम्भवत: महिला को उसे पुनः सील कर फिर से पहनना था उसके मन में था कि वह उस चुकड़े को फिर से साड़ी मे सिलकर अपनी साड़ी बना लेगी। उस दृश्य को देखकर स्वामी दयानन्द का हृदय रो पड़ा और वे घोर चिंता के सागर में डूब गए  सोचने लगे कि यह भारत की कैसी दुर्दशा हो गई है जो आर्यवर्त कभी जगद्गुरु के पद पर आसीन था, जो भारत कभी सोने की चिडिया कहलाता था वहां इतना घनघोर दारिद्रय वाला देश कैसे बन गया एक माँ के पास मृत शिशु के लिए कफ़न भी उपलब्ध नहीं है। तभी स्वामी जी ने प्रण किया की इन लोगो को दुःख सागर से निकलने हेतु सर्वाधिक उपाय करने में सम्पूर्ण जीवन लगा दूंगा । स्वामी जी ने संकल्प लिया कि वह देश को गुलामी की जंजीरों से बाहर निकालने के लिये काम करेंगे , महर्षि दयानन्द आजादी का सूत्र निकालने चल पड़े , देश के कई राजाओं से संम्पर्क किया महारानी लक्ष्मीबाई , समेत देश के कई राजाओं से मिले जो अग्रेजों की पराधीनता स्वीकार कर चुके थे या लड़ रहे थे , उन दिनों उत्तराखण्ड़ की टिहरी , अस्कोट रियासतें अंग्रेजों की गुलाम नही थी , । महर्षि ने देश के राजाओं के साथ – साथ सन्याशियों का संगठन भी बनाया हरिग्नार के चण्ड़ी पर्वत पर उन्हें एक साथ बिठाया यही नही स्वामी जी रो कई साधु सन्तों का आशिप्वाद व मार्गदर्शन भी मिला जिसमे , स्वामी पूर्णानन्द , बृजानन्द ,गोरक्षपीठ के सन्यासी व सूफी सन्त शामिल रहे तो कई नामचीन सन्यासी अखाड़ो का तिरस्कार भी उन्होंने सहा ,महर्षी दयानन्द तब स्वयं भी जूना अखाड़े के सन्यासी थे । स्वामी जी ने जाट विरादरी की सर्वखाप पंचायतों के साथ भी बैठके की ,जाट बिरादरी के अद्भुत साहस ,संगठन से स्वामी जी बहुत ही प्रभावित हुवे , महर्षी दयानन्द ने जाट बिरादरी को सत्यार्थ प्रकाश मे अत्यधिक सम्मान के साथ रेखांकित किया है । इस प्रकार 1860 की क्रान्ति की भूमिका तैयार की गई यदि सब कुछ योजना के अनुरूप होता तो देश 1860 मे ही आजाद हो गया होता ,किन्तु ब्राह्मण, जाट ,व सिल्पकार , आदिवासी व राजपूत राजा रजवाड़े मुस्लिम , सन्यासी मिलजुल कर लड़े भी , मुखबिरी भी जमकर हुई ,। अग्रेजों ने देश मे ही जातियों के बीच पूर्व से फैलाई गई जातिगत बैमनस्य कूटनीति फैलाकर 1860 की क्रान्ति , बिफल कर दी । इस घटना से महर्षि अत्यधिक दुखी हो गये ।

1857 से 1860 तक महर्षि दयानन्द अल्मोड़े की दूनागिरी की पहाड़ियों मे गुप्त जीवन बिताने लगे यह स्थान अब उत्तराखण्ड़ के अल्मोड़ा जनपद में है । दूनागिरी मे कई सिद्ध ,महात्मा साधना मे रत रहते थे । 1860 के आसपास महर्षि दयानन्द फिर से देश की आजादी का सूत्र ढूढने दूनागिरी से सल्ट रामनगर होते हुवे जोशीमठ पहुचें रामनगर में उनके अनन्य भक्त छिमवाल , के आवास में रुके । आर्य समाज रामनगर द्वारा ढिकुली में बनाये गये महर्षि दयानन्द कीर्ति स्तम्भ मे इसका उल्लेख है

स्वामी दयानन्द जी को अपने मोक्ष की चिंता नहीं थी वे दुखी मनुष्यों को दुःख सागर से पार कराना चाहते थे। उन्होने सत्यार्थ प्रकाश मे लिखा बिदेशी राजा कितना ही भला क्यों ना हो वह स्वदेशी राजा से भला नही हो सकता । इस प्रकार जोशीमठ में ही स्वामी दयानन्द को वैदिक भारत का सूत्र मिला , वह पुन: शिष्यभाव से गुरुवर बृजानन्द के पास गये , वेद वेदांग की शिक्षा ली , वेदों की ओर लौटो का नारा दिया । गुरुकुलों, स्वालम्बन , स्वशिक्षा का संकल्प व प्रचार प्रसार किया । 1875में आर्य समाज की स्थापना कर एक बार पुन:आजाद भारत की संकल्पना को साकार करने में जुट गये । आर्य समाज ने चतुर्दिक चेतना का प्रचार – प्रसार किया देश मे आजादी का आन्दोलन हिलौरे मारने लगा । आज के भारत मे नेका आप्य लमाज का नाम लेने से कतराने लगे है । उम्हें डर लगता है कि यदि आर्य समाज का नाम ले लिया तो उनका इतिहास मिट जायेगा इस भय से बामपन्थी व दक्षिण पन्थी , जिसमे गाँधीवादी काग्रेसी , संघ परिवार ,व समाजवादी सभी शामिल है ।

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