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1990 के बाद जब देश मे उदारीकरण की बयार बही तब से अब तक  देश में  राजनैतिक हल्कों में यह आम धारणा बढ गई है कि राजनैतिक दल अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिये ऐन चुनावों  से पहले अपनी सरकारों के माध्यम से जनता को ऐसे -ऐसे प्रलोभन दे रहे है  कि जनता उनके बहकावे में आकर मतदान करे ,किन्तु इतिहास मे जो पहले कभी नही हुवा , वह इस बार हुवा , अब पाकिस्तान ,बांग्लादेश , अफगानिस्तान के अल्पसंख्य हिन्दु ईसाई , व सिख भी भारत मे नागरिकता पा सकेंगे , पर सवाल यह है , कि सरकारी जमीनों मे बसे हुवे लोगों पर ही सरकारी जमीन खाली करमे का सरकारी दबाव है  इन लोगो को बसाने के लिये भी प्रयाप्त जमीमे नही है  ऐसे मे इन   प्रवासी नागरिकों को  देश  में कहा शरण दी जायेगी  यह यक्ष प्रश्न है ।,देश मे इन बिदेशी अल्पसंख्यको को बसाये जाने के प्रति जनमत यदि मौजूद है तो कितने  हिन्दु  इन्हे अपनी जमीन ,गाव , व बन देने  के लिये तैयार होंगे , देश की आजादी  1947 की तूलना मे जनसंख्या  लगभग पाच गुना बढ चुकी है , देश के संसाधन इस बड़़ी हुई आबादी को सुविधाये मुहैय्या कराने के लिये भी पर्याप्त नही है ऐसे मे देश में बिदेशों से आने वाली नई आबादी को बसाने के लिये भारत सरकार को नये बजट प्रविधान करने पडेगे जिसका दबाव , देश के मौजूदा नागरिकों पर पडना तय है ।

दूसरी ओर  पिछली सरकारो ने देश मे जो खाद्यान्न सुरक्षा कानून बनाया उसके तहत 80करोड लोगो को  खाद्यान्न  बितरित किया जा रहा है , इस योजना से भले ही देश भुखमरी से उबर रहा हो पर इस योजना ने देश में लोगो को मुफ्तखोरी की आदतों की तरफ धकेला है , जिससे लखों लोगो ने अपने खेत बंजर छोड दिये है । वह सरकारी खाद्यान्न पर  निर्भर हो गये है , इस योजना से भलेहि देश मे सरकारे बन जाये पर यह देश के संसाधनों  पर अतिरिक्त बोझ  है ।, मुफ्त राशन के बजाय काम के बदले अनाज योजना ज्यादा प्रभावी हो सकती थी ,चुनाव से पहले मजदूरों को  तमाम तरह की सामग्री देना एक तरह का प्रलोभन ही है , वही बिपक्षी दल भी प्रवोभन देने कही  पीछे नही है ।.

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