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राष्ट्रीय गणित दिवस पर विज्ञानं धाम देहरादून में चन्दन घुघत्याल का व्याख्यान

गणित एक अमूर्त विषय नहीं अपितु हमारी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो कि हमेशा हमसे सदा जुड़ा रहा है। हम जैसे ऑक्सीजन के बिना जीवित नहीं रह सकते उसी प्रकार गणित भी हममे है और हम गणित में हैं। हमारा निर्माण एक सैल से होता है , हमारे शरीर में हर अंग गिनती में ही होते हैं। हार्टबीट, नजर, ब्लड प्रेशर सबका आकलन नंबरों से ही होता है। नम्बर हमारे साथ हमेशा रहते हैं, सोने का, उठने का, खाने का, खेलने का निर्धारण भी तो नंबरों से ही होता है। भगवान ने भी हमारे शरीर का निर्माण गणित के अनुपात और समानुपात के आधार पर किया है। हम अपनी बोलचाल में शायद ही गणित के अंकों के प्रयोग के बिना आपसी समन्वय बिठा पाएं। हमारी बोलचाल की भाषा में अंक बहुत महत्त्वपूर्ण रोले प्ले करते हैं। एक घूंठ पानी पी लें , दो मिनट आराम कर लें, चार कदम और चल लें, आदि आदि। अपनी बातचीत को प्रभावी बनाने के लिए हम हिंदी के मुहावरों में गणित का प्रयोग करते हैं, जैसे एक अनार सौ बीमार , सौ सुनार की एक लुहार की , नौ दो ग्यारह होना , सातवें आसमान पर होना , आँखें चार होना, आदि।
घर से निकलते ही ओला बुकिंग में ऑटो या कार की बुकिंग हम किराया देख कर करते हैं, सहयात्रियों की संख्या के आधार पर छोटे या बड़े वाहन की ब्यवस्था करना, वाहन की चाल , दूरी और समय, यात्रा का आय ब्यय, आदि यह सब ही तो गणित है। जिस प्रकार हम अपने आप चलना सीख जाते हैं, इशारों या संकेतो से अपनी बात को प्रेषित कर पाते हैं , उसी प्रकार गणित को हम अपने आप सीख जाते हैं। शैवावस्था से ही हम खिलौनों, कंचे , कंकड़ (पबब्लस) से खेलते हुवे गणित को देखते और समझते हैं। गणित क्योंकि हमारे चारों ओर विद्यमान है, माँ बाप और टीचर्स के द्वारा एक विशेष नाम के साथ हम अपने अंदर विद्यमान गणित को फिर एक्सप्रेस करते हैं।
पुरे राष्ट्र की न्युमेरसी बहुत ही चिंताजनक है। ncert द्वारा कराये गए सर्वेक्षण में कक्षा ८ तक तो हालत बहुत ही ख़राब है। कक्षा ३ में आंकिक दर ५७ प्रतिशत है तो उत्तराखंड में केवल ५१ %। कक्षा ५ में देश में ४४ % तो उत्तराखंड में केवल ३९ % है वहीँ कक्षा ८ में देश में ३६ % है तो न्युमेरसी उत्तराखंड में केवल ३५% है। हमें इस पर काम करने की बहुत जरुरत है। गणित को आत्मशात कर ही यह लेवल बढ़तया जा सकता है।


नेशनल अचीवमेंट सर्वे 2017 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में कक्षा ८ तक गणित में बच्चों का पास प्रतिशत ५०% से भी नीचे है ।

सभी १३ जिलों में गणित की स्थिति अमूमन एक जैसी है। अल्मोड़ा और उत्तरकाशी जिले में ३३%, बागेश्वर में ४१%, चमोली में ३९%, चम्पावत में ३४%, देहरादून में ४०%, पौढ़ी में ४६%, हरिद्वार में ४४%, नैनीताल में ३७%, पिथौरागढ़ में ४२%, रुद्रप्रयाग में ४३% और उधमसिंह नगर में गणित में पास प्रतिशत ३८% है। टिहरी जिले में सबसे ज्यादा पास प्रतिशत ४९% है। कक्षा ८ तक ही तो बच्चों के ज्ञान का फोर्मटिव पीरियड होता है। बच्चा अपने जीवन का आधार मजबूत यहीं तक करता है। यदि आधार मजबूत होगा तो बच्चों का भविष्य स्वर्णिम होगा। गणित तो जीवन की समझ सीखाता है, समस्याओं का हल ही तो गणित है। यदि इसी हल रूपी जादुई छड़ी से हम दूर होंगे तो हमारा भविष्य कैसा होगा।?
मासिक परीक्षा कराने और चुश्त दुरश्त ब्यवस्था कराने के बाद २०२१ के अचीवमेंट सर्वे में थोड़ा सुधार जरूर हुवा है, लेकिन राज्य का कुल अचीवमेंट लेवल ३५ वे -३६वें स्थान पर होना भी चिंताजनक है। कक्षा ३ में गणित का पास प्रतिशत ५१ है लेकिन ५ वीं , ८वीं और १० वीं कक्षाओं में पास प्रतिशत क्रमशः ३९ , ३५ और ३२ प्रतिशत है। इतना कम गणितीय ज्ञान वाला बच्चा आगे की प्रतियोगी परीक्षा कैसे पास कर पायेगा और कैसे यह बच्चा और राज्यों के बच्चों से प्रतिस्पर्धा कर पायेगा? हम सबको सामूहिक प्रयास कर राज्य के गणितीय ज्ञान को बढ़ाना होगा। गणित को रुचिकर बनाना होगा। गणित को व्याहारिक ज्ञान से जोड़ना होगा।

देवभूमि के नाम से विश्व प्रसिद्ध हमारे राज्य का कुल क्षेत्रफल ५३४८३ वर्ग मीटर है। इसकी जनसँख्या एक करोड़ ८६ हजार २०० है , कुल साक्षरता प्रतिशत राज्य का ७९ प्रतिशत है। विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान इस राज्य में स्थापित हैं। देश के शीर्ष स्तर के कवि, लेखक , ब्यूरोक्रेट और राजनेता यहाँ जन्मे। देश विदेश के पर्यटक भी यहाँ आते ही हैं और तो और बढे बढे लेखक और कवि भी इस देवभूमि में आकर रचनाये करते हैं। इन सबके बाबजूद हमारे राज्य के शिक्षा स्तर में आयी गिरावट चिंता का विषय है। शिक्षाविद और शिक्षा अधिकारी गहन चिंतन मनन कर ही रहे हैं। डाइट्स और SCERT में युद्ध स्तर पर काम हो रहा है, लेकिन हर शिक्षक को भी अपने स्तर पर पहल करने की नितांत आवश्यकता है।
उत्तराखंड राज्य में उत्तराखंड के नुमेरसी (आंकिक ) दर को बढ़ाने के लिए हम सभी गणित शिक्षकों को अपने स्तर पर ठोस कार्य करने की नितांत आवश्यकता है। यदि हम अपने बच्चों को विशेषकर कक्षा ८ तक, गणित को एक विषय की तरह न पढ़ाकर, एक एक्टिविटी की तरह पढ़ाएंगे तो बच्चा गणित बेहतर सीखेगा। जैसे कि बच्चे फुटबॉल, कबड्डी , हॉकी, क्रिकेट, आदि को बढे मनोयोग से खेलते हैं, यदि गणित को भी ऐसे ही करेंगे तो गणित में उनकी रूचि बढ़ेगी, फिर वह बढ़ी कक्षाओं में भी गणित को रूचि के साथ पढ़ेगा।


गणित अपने आप में एक भाषा है, यह तो वैश्विक भाषा है , जो कि हमारे आस पास ही नहीं बल्कि हममे स्वतः विधमान है।

आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक ने कहा था “ब्रह्माण्ड को गणितीय भाषा में लिखा गया है।” पूरा ब्रह्माण्ड गणित के आकारों, प्रतिकारों , सिद्धांतों , प्रमेयों , प्रयोगों , अनुप्रयोगों से भरपूर है। सुबह की बेड टी में चाय चीनी और दूध का सटीक सम्मिश्रण, नाश्ते में खाये जाने वाले पराठे बृत्ताकार और ब्रेड चौकोर , हमें गणित का हमारी राजमर्रा की जिंदगी में होने का आभास दिलाती है। सब्जियां और फल भी तो गणित को अपने में या गणित में ये सभी समाये हैं। टमाटर, अमरुद जहाँ इलिप्स के समीकरण के साथ हमें आकर्षित जरते हैं, तो गाजर, मूली आदि शंकु का आयतन लिए तने रहते हैं। गोले और बेलन तो यहाँ वहाँ अमूमन हर चीज में मिल ही जाते हैं। कोण और रेखा तो हमें हमरा नजरिया बताते हैं। छोटे बढे पहाड़, खेत खलिहान तो हमें गणित को आत्मसात करने को खींच लेते हैं। प्राकृतिक घटनाएं जैसे सूर्योदय, सूर्यास्त, वर्षा , इंद्रधनुष , तापमान आदि हमें ग्राफ और फंक्शन सीखाते हैं। बादलों की कढ़कढाहट, चिड़यों कि चहचहाट, से ध्वनि तरंगे और उनके समीकरणों के प्रवाह होने का ज्ञान होता है। पाइनएप्पल, पाइन कोन , शंख और सन फ्लावर आदि एक विशेष अनुपात डिवाइन रेश्यो (गोल्डन रेश्यो) को प्रदर्शित करते हैं , तो बहती नदी, वेग और त्वरण बताते हैं। दिन प्रति दिन घटने वाली घटनाएं क्यों और कैसे होती हैं, यह हल भी तो गणित ही बताता है।
गणित फोबिया कहने वालों को चिड़ियों के घोसलों को देखकर सोचना चाहिए कि यह बेजान प्राणी कैसे तरह तरह के घोंसले बनाती है ? एक कुशल आर्किटेक्ट से भी बेहतर घोंसले बनाने वाली चिड़िया से सीख लेकर गणितीय सोच विकसित कर सकते हैं। दिन रात मेहनत करने वाली मधुमखी के षट्कोणीय छत्त्ते का रहस्य जानकार गणित फोबिया कहने वाले भी यही सोचेंगे कि यदि मधुमक्खी गणितज्ञ हो सकती है तो वह क्यों नहीं ?
गणित ही हमारा तारणहार कहे या सहायक, लेकिन यह हममे में है और हम गणित में हैं।
महान गणितज्ञों ने गणित को देखा, महसूस किया, समझा और अभिव्यक्त किया। आज हम राट्रीय गणित दिवस बना रहे हैं श्री रामानुजन के जन्मदिन २२ दिसम्बर को, गणित पखवाड़े के तहत हम सभी एकत्रित हैं , मैं इस मंच से आप सभी बुद्धिःजीवियों से यही अपील करूँगा कि जिस तरह रामानुजन नंबरों के प्रति काफी आकर्षित थे , हम सभी भी नंबरों के खेल खेलें , अपने पसंदीदा नंबरों से मैजिक स्क्वायर बनायें , मानसिक गणना को प्रोटासित करें , यही श्री रामानुजन के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

चन्दन घुघत्याल
गणित विभाग , दून स्कूल

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