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जब देश गुलामी की जंजीरों मे जकड़ा हुवा था , देश मे सनातन धर्मावलम्बियों मे पाखण्ड अन्धविस्वास घर कर गया था ऐसे समय मे एक राष्ट्र सन्त ने इस देश की धरा मे एक सम्पन्न परिवार मे जन्म लेकर , सन्यास व राष्ट्रभक्ति की दिशा मे कदम बढाये । मूलशंकर इनका बचपन का नाम था पिता राजकोट रियासत के दीवान थे , उदीच्य ब्राह्मण कर्षण तिवारी इनके पिता का नाम था ।

परिवार संम्पन्न था घर में नौकर चाकर सब थे , पर इन्हे यह रास नही आया , जूना अखाड़े के कुछ राष्ट्रभक्त सन्यासियों के साथ इन्होने देश की आजादी के लिये 1857 का तानाबाना बुना असफल होने पर तीन वर्ष उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जनपद के दूनागिरी पर्वत मे अज्ञातवास मे रहे , फिर बद्रीनाथ मे जाकर स्वामी पूर्णानन्द से आशिर्वाद लेकर गुरु विरजानन्द के पास वेदादि शास्त्रों व वेद ब्याकरण पढा , फिरसे देश में तमाम पन्थ मजहबो के पाखण्ड़ो को चुनौती देते हुवे देश की सनातन संस्कृति को जगाने का काम करने लगे । किन्तु पाखण्ड मे गले तक डूब चुके सनातन धर्म के कतिपय लोगों को उनका यह कार्य पसन्द नही था । स्वामी दयानन्द भारत मे पहले ब्यक्ति थे जिन्होंने सनातन ही नही अपितु इस्लाम व ईशाईयों के धार्मिक पाखण्ड पर भी पहली बार प्रहार किया , 1875ं मे आर्य समाज स्थापित किया देश मे सनातन चेतना का उभार आया ।किन्तु हिन्दु पाखण्ड़ी तो जान लेवा ही बन गये महर्षि दयानन्द को जब कई बार जहर देकर मारने का प्रयास असफल हुवे जहर हर बार बेअसर हो जाता तब उन्हे उन्ही के रसोइये जगन्नाथ ने दूध मे सीसा मिलाकर पिला दिया , कई दिन अपनाववेद भाष्य मे लेखन मे रोगावस्था मे कार्य करते हुवे दीपावली के ही दिन महर्षि ने अपनी इच्छानुसार प्राण त्यागे , इसीलिये आर्य समाज मे दीपावली के साथ ही महर्षि दयानन्द का निर्वाण दिवस भी मनाया जाता है ।

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