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इन दिनों श्राद्ध पर्व चल रहे है , लोग सोसियल मीड़िया मे तरह -तरह का ज्ञान झाड़ रहे है , कोई कह रहा है कि ब्राह्मण का कनेक्शन मृत पितरों से है , कोई कह रहा है कि श्राद्ध जीवितों का करो , कोई कहता है कि ब्राह्मण लोगों को ठग रहे है , कोई कहता है कि ये उच्च पदों पर कैसे है कोई कह रहा है कि ये दुनिया की बड़ी-बडी कम्पनियों के सी ई ओ कैसे बन गये , , अब तो ब्राह्मणों पर जुबानी नही शारिरिक हमले भी होने लगे है वह दिन दूर नही जब नफरतों के बाजार को पंख लगेंगे देश जातीय संघर्ष की भेंट चढ जायेगा ।गरीब व कमजोर ब्राह्मण नफरतों का शिकार होंगे अमीर तो विदेशों मे बस ही रहे है ।जब देश में मैकाले शिक्षा नही थी , तब देश मे शिक्षा का भार ब्राह्मणों के ऊपर था ।उस समय समाज ब्राह्मणों की सभी जरूरतों की पूर्ति करता था , बदले मे ब्राह्मण समाज अपनो यज्ञमानों की शिक्षा दिक्षा , संस्कार का दायित्व ब्राह्मणों के पास था , ।आज भी जिनके परिवारों मे कुलगुरु कुलपुरोहित की परम्परा है, वे लोग अपने पुरोहित के लिये अन्न , धन, व आवास की सुविधायें प्रदान करते है । श्राद्ध कुल पुरोहित परम्परा के संरक्षण का ही पर्व है। श्राद्ध मे यजमान संकल्प लेता है , कि सनद कुमारों से लेकर अपने पिता माता तक की परम्परा पर मै श्रद्धा ब्यक्त करता हूँ , ।मृत पितरों के प्रति श्रद्धा व जीवित पितरों को अन्न , वस्त्र आभूषणों से तृप्त करना तर्पण कहलाता है ,। पुरोहित श्राद्ध मे , देव , दानव मानव , यक्ष , गन्धर्व किन्नर ,भूत प्रेत , पिचास , यक्ष नाग कुर्म , पन्च महाभूत , वेद , पुराण , जलचर नभचर थल चर से लेकर प्रपितामह पितामह पिता ज्येष्ठ.कनिष्ठ , प्रमातामही मातामही ,माता सास ससुर नाना नानी आदि के प्रति श्रद्धा का संकल्प लेता है । श्राद्ध का जीवित व मृत पितरों से नही अपनी परम्पराओं के प्रति उसी प्रकार की श्रद्धा से है जैसे पितर करते आये है , ।किसी भी आयोजन भोजन व दक्षिणा आयोजन की अनिवार्य शर्त है । यह क्षमतानुसार ही होना चाहिये ,। शास्त्रकार कहते है कि हमे अपनी कमाई का दशवा हिस्सा इन कार्यों मे खर्च करना चाहिये । यही कार्य करानाव ब्राह्मण का धर्म व कर्मकाण्ड है , जो ना करना चाहे उसे बाध्य नही किया जा सकता । अंग्रेजी पठकर श्राद्ध के महत्व को नही समझा जा सकता ।

उसी प्रकार क्षत्रिय समाज गुलामी से पहले तक रक्षा व खेती , का दायित्व सभालता आ रहा था , ।वैश्व समाज अभाव को दूर करने व शूद्र समाज वस्तुओं का निर्माण परिवहन , कर रहा था ,। शूद्र वर्ण मे ही शिल्पकार , कलाकार , हुवा करते थे ,किन्तु मुगलों व अग्रेजों ने भारत को जब अपना गुलाम बनाया तो आपूर्ति को सबसे पहले ही प्रभावित किया , शिल्पकारों के शिल्प को बर्बाद कर , वैश्यों के ब्यापार पर हमलाकर क्षत्रियों के शौर्य का मर्दन कर ,ब्राह्मणों के गुरुकुलों को बन्द कराकर देश के पराम्परागत ढांचे पर प्रहार किया गया , आज देश में बैमनस्य की फसल उगाकर उसमें से बोट बटोरे जा रहे है ।

देश भर में जब से मैकाले शिक्षा का चलन हुवा तभी से ब्राह्मण संस्कारशालाओं व शिक्षा पर हमले हो रहे है , । वर्ण ब्यवस्था पर पहला हमला मुगलो व मैकाले पुत्रों ने किया , उसके बाद वामपन्थी विचारकों , के अलावा , महात्मा ज्योतिबा फूले , पेरियार व भीमराव अम्बेदकर के शिष्य लगातार हमलावर है , अंग्रेजों ने अपने प्रचार तन्त्र के माध्यम से उनके मन मे यह बिठा दिया है कि उनके पिछड़ेपन का कारण मुगलों अंग्रेजों द्वारा उनके रोजगार पर हमला नही अपितु ब्राह्मण है । अंग्रेजों ने जब शिक्षा का नया ढांचा बनाया तो मन्दिरों मे चल रहे गुरुकुल बन्द करा दिये गये , इसके स्थान पर अंग्रेजो द्वारा , स्थापित ,पाठ्यक्रम के आधार पर नये स्कूल खोले गये , कहा जाता है कि ज्योतिबा फूले ने अंग्रेजों की इस ब्यवस्था को हाथों हाथ लिया , नई ब्यवस्था के बाद गुरुकुलों का चलन बन्द हो गया ,। तब ब्राह्मणों के उपर रोजी रोटी का संकट आ गया , अब , ब्राह्मण केवल कर्म काण्ड़ से ही अपनी आजीविका चलाने लगे , । आर्थिक बिपन्नता , व शिक्षा के प्रति आकर्षण के कारण अंग्रेज भी ब्राह्मणों पर निर्भर होने लगे , उसी दौर मे अंग्रेज समझ गये थे कि यदि हिन्दुस्तान को चिर काल तक गुलाम बनाना है तो देश की सबसे बुद्धिमान कौम को दबाना होगा , एक रणनीति के तहत देश मे नाम के साथ जाति लिखने की परिपाटी का शुभारम्भ फिर कालान्तर मे जातीय जनगणना भी हुई , ।अंग्रेजो की समझ मे यह बात आ गई कि भारत के सामाजिक ढांचे में जातियों का उपयोग कैसे किया जाय । अंग्रेजों को 1857 की बिफल क्रान्ति मे इस जातीयता का ज्ञान हो गया था । अंग्रेजी शासन में यग्यपि ब्राह्मणों रे गुरुकुल बन्द हो गये थे , उसके बाद भी ब्राह्मणों की सामाजिक प्रतिष्ठा मे कोई कमी नही थी , देश आजाद हुवा , देश का नेतृत्व तब भी ब्राह्मणों रे पास था पर देश ने औपनिवेशिक कानूमों के तहत आजादी पाई थी जिसमें सनातन धर्मावलम्बी अपने मन्दिरों मे दान के धन से धार्मिक शिक्षा केन्द्र नही खोल सकते , भाषा के आधार पर खोल सकते थे ,पर उसमें भी अंग्रेजी अनिवार्य थी , जैसे डी ए,वी ,ऐग्लो संस्कृत विद्यालय आदि आज भी मन्दिरों मे बनाये गये ट्रस्टों से सरकार जो धन उगाही करती है , वह अल्पसंख्यकों के लिये भी खर्च करती है पर यह धन हिन्दुओं के धार्मिक प्रचार मे खर्च नही होता ।

इन दिनों कम्पनियों व मशीनों के कारण अपना परम्परागत रोजगार खो चुके शिल्पकार कलाकार , गीतकार , सफाई कर्मी ,नाई , धोबी , चर्मकार , बुनकर , मल्लाह ,आदि परम्परागत रोजगार करने वाले लोग , ठीक उसी प्रकार सरकारी रोजगार मे अपना हिस्सा चाहते है , जिस प्रकार शिक्षा व संस्कार के ढाचें मे बदलाव के बाद , मजबूरी में अपना परम्परागत कार्य छोड़ ब्राह्मणों ने सरकारी गैर सरकारी रोजगार मे अपनी हिस्सेदारी ले ली , , वर्तमान में भारत सरकार सरकारी रोजगार को समाप्त कर निजि क्षेत्र में रोजगार बढा रही है ,पर निजि क्षेत्र खैरात में नौकरिया नही देता , तमाम बदलाव के बाद भी आज भी देश में परम्परागत रोजगार है जिन्हे हीन भावना से देखा जा रहा है , । हिन्दु धर्म मे पुरोहित कर्म , सफाई कर्म , नृत्य संगीत , बारबर का काम , वैध्य का काम , खेती , आदि सभी कार्य हीन कर्म के पर्याय हो गये है , गैर परम्परागत लोग यदि इन कार्यों को करे तो कोई परेशानी नही पूजा पाठ को छोड़कर शेष कार्य मुस्लिम नवयुवक कर रहे है ।पर हिन्दु जातियों को उस कार्य मे हिस्सेदारी चाहिये जो कार्य ब्राह्मण करते है वह चाहे सरकारी नौकरी हो या फिर पुरोहित्य कर्म , देश में एक कम्पेन चलाई जा रही है कि जन्म से कोई ब्राह्मण नही होता , पर जिसके घर मे जो कार्य परम्परा से होता है उस घर के बच्चे परम्परागत कार्य मे ज्यादा दक्ष होते है , । जिसे पुरोहित्य कर्म मे दक्ष लोगों की जरूरत नही है वह स्वयं अपने संस्कार कराये ।किन्तु यह संम्भव नही है, क्योकि ज्ञान स्वत: नही आता इसके लिये विधान सीखना पड.ता है । जो ब्राह्मण बन गया वह संस्कार करा सकता है , । जिसे ब्राह्मण से घृणा हो गई वह उन्हें ना बुलायें

जंगल मे रहने वाले असंस्कारित समुह कोई संस्कार नही करते पर सामाजिक नियमों का पालन वे भी करते है जिसे जंगल वाली खानाबदोश जिन्दगी पसम्द है उसके घर मे पुरोहित का क्या काम ।

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