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अल्मोड़ा 2 फरवरी 1984 को अल्मोड़ा के एक छोटे से गांव घुंगोली – बसभीड़ा (चौखुटिया) से शुरू हुआ ऐतिहासिक “नशा नहीं रोजगार दो, काम का अधिकार दो” आंदोलन को 40 वर्ष पूरे हो रहे हैं। पिछले 40 वर्षों में इस जन आंदोलन की वर्षगांठ पर आंदोलन की जन्मस्थली बसभीड़ा में विकट हो रहे नशे और रोजगार के सवाल पर गंभीर चिंतन – मनन के साथ उत्तराखंड की ज्वलंत समस्याओं पर सामूहिक विचार विमर्श का क्रम जारी रहा है।

नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन का नेतृत्व आंदोलन के शुरुआती दौर में प्रखर युवा आंदोलन की प्रतीक रही उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के हाथों में था। बसभीड़ा, चौखुटिया, मासी, भिक्यासैंण, सल्ट, स्यालदे, द्वाराहाट, सोमेश्वर, रामनगर, गैरसैंण, गरमपानी, भवाली, रामगढ़, नैनीताल आदि जैसे क्षेत्रों में आंदोलन का जबरदस्त प्रभाव रहा। इस आंदोलन के नारों में “जो शराब पीता है परिवार का दुश्मन है” “जो शराब बेचता है समाज का दुश्मन है” “जो शराब बिकवाता है देश का दुश्मन है” और “नशे का प्रतिकार न होगा, पर्वत का उद्धार न होगा” जैसे नारों की लगातार धूम रही।

2 फरवरी 1984 को बसभीड़ा में हुई आंदोलन की पहली जनसभा में सर्वसम्मति से क्षेत्र में हर हाल में जुए व शराब पर रोक लगाने की घोषणा के साथ ही आंदोलन शुरू हो गया था।इससे एक दिन पहले चौखुटिया में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के नेताओं ने आबकारी विभाग के अधिकारियों को गाड़ी में अवैध शराब ले जाते हुए पकड़ था। इसके साथ ही आंदोलनकारियों के जत्थों ने स्वयं नशे के तस्करों के यहां छापे डालने, अवैध मादक पदार्थों के गोदाम ध्वस्त करने और तस्करों का मुंह काला कर बाजार में घुमाना शुरू कर दिया था। 7 फरवरी 1984 को चौखुटिया में हजारों आंदोलनकारियों ने शराब के तस्करों को स्वयं गिरफ्तार कर उनके मुंह काले कर बाजार में घुमाया था। 26 फरवरी 1984 को ब्लॉक मुख्यालय चौखुटिया में तत्कालीन जिलाधिकारी एवं जिला न्यायाधीश की उपस्तिथि में आयोजित वृहद कानूनी सहायता शिविर में हजारों लोगों ने नगाड़े निशानों के साथ प्रदर्शन कर जिला अधिकारी अल्मोड़ा को शराब के पुख्यात तस्करों को गिरफ्तार न करने पर सबने अपनी गिरफ्तारी देने की घोषणा की थी। इस प्रदर्शन के डर से तमाम नशे के बड़े व्यापारी रामगंगा नदी के किनारे भागते देखे गए थे। यह सिलसिला महीनों तक चलता रहा। 26 मार्च 1984 को जिला मुख्यालय अल्मोड़ा में आंदोलनकारियों के विरोध के बावजूद हो रही शराब की नीलामी का जबरदस्त प्रतिकार हुआ इसमें आंदोलन के 40 से अधिक नेता गिरफ्तार किए गए। इस दौरान घुंगोली, बसभीड़ा, बाखली, चौखुटिया क्षेत्र से आई महिलाओं ने कलेक्ट्रेट अल्मोड़ा में सारे सुरक्षा अवरोध ध्वस्त कर दिए। जिस कारण नीलामी रोक दी गई व नीलामी में आए शराब व्यवसायी भाग गए। इनमें से कुछ को खैरना गरमपानी में जनता ने पकड़ कर लगभग नंगा कर उन्हें कान पकड़वाकर उनकी परेड करवाई थी। 12 प्रतिशत से अधिक अल्कोहल की दवाओं को शराब घोषित करते हुए उनकी बिक्री पर रोक लगा दी। 31 मई 1984 को तत्कालीन सांसद हरिश रावत के साथ हुए टकराव में 12 आंदोलनकारियों पर मुकदमे दर्ज किए गए जिसके बाद 2 जून 1984 को चौखुटिया में और 17 जून 1984 को नैनिताल में विशाल प्रर्दशन हुए । यह मुकदमें 12 वर्षों तक रानीखेत न्यायलय में चलते रहे।

“नशा नहीं रोजगार दो, काम का अधिकार दो” जैसे नारे आज हमारे समाज में पहले से ज्यादा प्रासंगिक बनकर खड़े हैं। उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण के इस दौर में जब हर तरह के नशे और युवाओं के सामने a का संकट खड़ा है हमारे युवाओं को हताशा, निराशा में नशे के दलदल में धकेला जा रहा है “नशा नहीं रोजगार दो” का 40 साल पुराना नारा रोजगार के अधिकार को मूल अधिकार बनाने का प्रश्न सबसे बड़ा प्रश्न बनकर हमारे सामने है। इस आंदोलन को लेकर उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि पिछले 40 वर्षों में इस आंदोलन को हमेशा याद करते हुए आज की ज्वलंत समस्याओं प्राकृतिक संसाधनों, जमीनों की लूट के खिलाफ संघर्ष की दृष्टि और साहस भी इस जन आंदोलन ने हमें और हमारे समाज को दिया है। एक ऐसे वक्त में जब हम अपने राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणापत्रों में आए सुनहरे वादों को भी तुरंत भूल जाते हैं “नशा नहीं रोजगार दो” आंदोलन की प्रखरता ऊष्मा आज भी हमारे समाज का हिस्सा है और इस आंदोलन में भागीदारी करने वाले, उसे जानने वाले तमाम साथियों से उम्मीद की जानी चाहिए कि वे इस आंदोलन की प्रासंगिकता पर गंभीरता से चर्चा करते हुए उसे हमारे युवाओं तक पहुंचाने की कोशिश का हिस्सा बनें।

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