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अल्मोड़ा हिमालयी लोक संस्कृति एवं लोक कला की संमृद्ध वैभवशाली परंपरा को संजोने की मांग के साथ हिमालयी लोक संस्कृति पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार समाप्त हुवा इसमें इतिहासविदों एवं पुरात्वविदों ने दो दिन तक मंथन
शोध निष्कर्षों एवं सुझावों को सरकार के सामने लाने की आवाजें उठी ।
इतिहासविद् एवं सोबन सिंह जीना विवि के विभागाध्यक्ष प्रो विद्याधर सिंह नेगी ने कहा कि “हिलालयी लोक संस्कृति“ पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार में देश-विदेश से अल्मोड़ा में जुटे तमाम इतिहासकार एवं पुरातत्वविद्ों ने गहन विचार विमर्श किया। उन्होंने बताया कि सेमीनार में तकरीबन दो सौ से अधिक शोध पत्रों का वाचन किया गया। जिसमें मुख्यतः लोक संस्कृति, परंपराओं, लोक साहित्य, लोक भाषा, लोक नृत्य, लोक वाद्य यंत्र, लोक वेष भूषा, वैदियकी पूजा पद्धति, लोक चित्रकला, तीर्थाटन पर्यटन से संबंधित शोध पत्रों को बारह तकनीकी सत्रों में पढ़े गए। उन्होंने बताया कि लोक संस्कृति एवं सभ्यता को बचाने के लिए सेमीनार से निकले निष्कर्षो, सुझावों को सरकारों के सामने रखा जाएगा। ताकि, विलुप्त हो रही हिमालयी लोक संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु समय रहते कारगर उपाय अपनाए जा सकें।
प्रो बीडीएस नेगी ने बताया कि शनिवार और रविवार को आयोजित सेमीनार में पर्तगाल से आईं फ्लौर कार्ला वेरियाटो, उर्स स्टरबेल, पद्य्श्री ललित पांडे, कनाडा से आये डाॅ अंतरिक्ष कुमार, अमेरिका से पहुॅचे डाॅ भगीरथ जोशी ने अंतराष्ट्रीय सेमीनार से निकले निकले निष्कर्षों एवं सुझावों पर गहन मंथन किया। उन्होंने बताया कि विद्वत्जनों ने एक सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि हमें अपनी लोक परंपराओं एवं लोक संस्कृति को संजोने अनेक दूरगार्मी कदम उठाने होंगे। ताकि अपनी संमृद्ध एवं वैभवशाली पुरातन सभ्यता एवं परंपरा को बकरार रखा जा सके। सभी ने पाश्चात्य संस्कृति का अंधाधुंध नकल समाज एवं संस्कृति के लिए घातक बताईं। कहा कि लोक कलाकार युवा अवस्था में अपनी कला से लोगों का मनोरंजन तो करता ही है पर अपनी लोक संस्कृति को भी जीवित रखने में कारगर सिद्ध होता है। ऐसे में वयोवृद्ध जरूरतमंद लोक कलाकारों को चिहिन्त कर प्रति माह वेतन या पेंशन इत्यादि सुविधाएं उपलब्ध कराईं जाए। हर राज्य से लोक गीत-संगीत-नृत्य एवं नाटक विद्या में योग्य लोक कलाकारों को लोक कला एवं सांस्कृतिक प्रोत्साहन नीति के तहत राष्ट्रीय अवॉर्ड दिए जाए। इनका चयन हरियाणा सरकार द्वारा स्वीकृत करके भेजे जाए। लोक गीतों एवं नृत्यों के संरक्षण के लिए भी प्रयास किये जाने चाहिए। जैसे बैर, बगनौल, खुदेड़, न्यौली, झपेली, हुड़किया बाॅल, झोड़ा के संवर्धन एव उत्थान के लिए स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किए जाए। लोक कलाकारों को आर्थिकी प्रश्रय एवं भत्ता दिया जाए। स्थानीय पर्यटन को जोड़ने के लिए छोटेछोटे सर्किट बनाए जाए, लोक पकवानों, लोक कला जैसे दस्तकारी, ताम्र उद्योग को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्र विशेष चिहिन्त कर विकसित किया जाए। विलुप्त होती स्थापत्य कला, व्यवसाय को जाग्रत करने के प्रयास हो। शैलाश्रयों, ताम्र पत्रों, लिपियों एवं संग्रहालयों को जगह जगह विकसित किया जाए।
प्रो नेगी ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार में रिसोर्स पर्सन के तौर पर अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ ईश्वर शरण विश्वकर्मा, लोक भाषाविद् प्रो देव सिंह पोखरिया, आंग्ल भाषाविद् प्रो एसए हामिद, मंदसौर विश्वविद्यालय की प्रो उषा अग्रवाल, उदयपुर विद्यापीठ के प्रो जीवन सिंह खड़कवाल, गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रो योगेंद्र सिंह फस्र्वाण, गोपेश्वर से शिवचंद सिंह रावत, पुरातत्व विभाग दिल्ली से डॉ अश्वनी अस्थाना, देहरादून के अधीक्षक पुरातत्वविद मनोज सक्सेना, क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डाॅ चंद्र सिंह चैहान, मेरठ के चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से प्रो विग्नेश त्यागी, अमेरिका विश्वविद्यालय से डाॅ भागीरथ जोशी, श्रीलंका से प्रो पूर्णिमा वीर सिंह, प्रो अनिल जोशी, कनाडा से डॉ अंतरिक्ष कुमार, भाषाविद डॉ विदुर चालीसे, देहरादून से डाॅ संदीप बडोनी, सल्ट महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो बीएस पांडे, पद्यश्री डॉ ललित पांडेय, डॉ ललित जलाल, डॉ दीपा जलाल, प्रो सोनू द्विवेदी, डॉ रिजवाना सिद्दीकी, पुर्तगाल से फ्लोर कार्लो वेरीयाटो जैसे तमाम इतिहासविद् एवं शिक्षाविदो ने स्थानीय लोक साहित्य, लोक भाषा, लोक देवता, लोक नृत्य, लोक गीतों, लोक परंपराओं, वेश भूषा, वैदिक संस्कार, औषधियों, स्थापत्य कलाओं पर गहन मंथन एवं चिंतन किया।

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