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नई दिल्ली, उत्तराखण़्ड़ ही नही अब केन्द्र सरकार भी समान नागरिक संहिता की दिशा में कदम उठाने जा रहू है भारतीय जनता पार्टी के सांसद किरोड़ी साल मीणा ने शुक्रवार को राज्यसभा में भारी हंगामे के बीच समान नागरिक संहिता विधेयक पेश किया जबकि इस बिल का विपक्ष ने विरोध किया। यह एक निजि बिल था जिसे संसद मे पेश किया गया इस विधेयक के पक्ष में 63 मत पड़े जबकि विपक्ष में 23 सांसादों ने मतदान किया।

समान नागरिक संहिता से निजि कानून होंगे प्रभावित

देश में समान नागरिक संहिता को लेकर कानूनी विशेषज्ञो की राय अलग – अलग हैं । कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि विवाह, तलाक, विरासत और संपत्ति के अधिकार संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत आतेहै । अत: समान नागरिक संहिता के सम्बन्ध में अनुच्छेद 44 कहता है कि यह केन्द्र का विषय है। अलग-अलग राज्यों के समान नागरिक संहिता बनाने का अधिकार नही है । क्योकि एक देश मे यदि दो कानून होंगे तो एक राज्य मे एक कीनून बैद्ध तो दूसरेरीज्य मे अबैध हो जायेगा

बटी हुई है कानूनी बिशेषज्ञों की राय

उत्तराखण्ड मे समान नागरिक संहिता के लिये सरकार प्रयाश कर रही है । अब केन्द्रीय सितर पर भी यही सोच बनाने की कोशिस हो रही है ।समान नागरिक संहिता का अर्थ है कि पूरे देश के लिए एक समान कानून ! ये कानून आदिवासी धार्मिक व ईलाकाई जनडातीय समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों मे भी लागू होंगें इसका प्रभाव हिंदू विवाह अधिनियम (1955), हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) के साथ ही मुस्लिम व्यक्तिगत कानून आवेदन अधिनियम (1937) जैसे धर्म पर आधारित मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों पर भी प़़ड़ेगा केन्द्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 44के अनुसार यह करने के लिये बचनबद्ध है

अनुच्छेद 44 का उद्देश्य कमजोर समूहों के खिलाफ भेदभाव को दूर करना है और देश भर में विविध सांस्कृतिक समूहों के बीच सामंजस्य स्थापित करना है। किन्तु यह कानून उनकी परम्परागत कानूनों पर प्रहार भी होगा । आदिवासी समाज को देश में निजि कानूनों का संरक्षण प्राप्त है ।

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