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अल्मोड़ा मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन से चिपके रहने से घातक परिणाम आ रहे हैं यह जानकारी देते हुवे डा जे सी दुर्गापाल ने कगा कि मोबाइल एवं सोशल मीडिया के निरंतर प्रयोग से समाज दूषित हो रहा है। अब लगभग सभी कार्य इनके माध्यम से ही हो रहे हैं। अब बच्चों और युवाओं की ऑनलाइन क्लासेज संचालित हो रही है। इनके निरंतर प्रयोग से स्वास्थ्य संबंधी कई समस्यायें उत्पन्न हो रही हैं। नेत्र चिकित्सक और पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डॉ.जे.सी.दुर्गापाल कहते हैं कि जिन बच्चों को हम मोबाइल, टेलीविज़न और कंप्यूटर से दूरी बनाओ कहते आये हैं आज ऑनलाइन क्लासेस के कारण अभिभावक भी चुप हैं। मोबाइल, सोसल मीडिया के बीच हम अपने बच्चों को समय व्यतीत करने के लिए छोड़ दे रहे हैं। जो बिल्कुल भी ठीक नहीं है। इससे एक तरफ नकारात्मकता बढ़ी है। वहीं बच्चों कीे दृष्टि प्रभावित हो रही है, उन्हें मानसिक थकान हो रही है। बच्चे इनके प्रयोग से लिख नहीं या रहे हैं। वो याद नहीं कर पा रहे हैं। लगातार मोबाइल की स्क्रीन पर आंखें गढ़ी रहने से बच्चों के रेटिना पर गलत प्रभाव पड़ता है। डॉ दुर्गापाल ने जानकारी देते हुए कहा कि कोई भी चीज के अच्छे और बुरे परिणाम होते हैं। कंप्यूटर, मोबाइल आदि में ज्यादा काम करना बालक,युवा और प्रौढ़ के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रहा है। इससे उनका दिमाग सिकुड़ रहा है, स्मरण शक्ति घट रही है और रेडिएशन का खतरा भी बना हुआ है। उन्होंने कहा कि मोबाइल का दुष्परिणाम है कि आज हिंसक घटनाएं घटित हो रही हैं। देश-प्रदेश में हालिया कुछ घटनाएं प्रकाश में आई हैं जिनमें बच्चों द्वारा चाकू घोंपने की निंदक घटनाएं सामने आई हैं। बच्चे मोबाइल एवं टेलीविजन में मार् काट के दृश्य देखकर अपने जीवन में भी उसको क्रियान्वित कर रहा है। यरः समाज के लिए चिंतनीय पहलू है।
चिकित्सक दुर्गापाल ने कहा कि कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर काम करने से दिमाग के सेल डैमेज होने लगते हैं, याददाश्त कम हो रही है, क्रोध आ रहा है, भूख खत्म हो रही है, वजन बढ़ रहा है, कलर ब्लाइंड होने का भय बनाहै, मोतियाबिंद की समस्या आ रही है और मानसिक विकार जैसी समस्या आ रही हैं। सोसल मीडिया के बदस्तूर प्रयोग ने बच्चों की सोशल लाइफ खत्म कर दी है। वे क्रूरता करने लगे हैं। क्लासरूम का माहौल ऑनलाइन में सिमट रहा है। ऑनलाइन पढ़ाई के बाद बच्चे उग्र होते दिखाई दे रहे हैं। बच्चों में कम उम्र से ही कुविकार आ रहे हैं। वह नशावृत्ति करने लगा है।
उन्होंने कहा कि कोरोना काल के बाद स्कूली बच्चों की आंखों से संबंधी समस्या बढ़ी हैं। प्रत्येक स्कूली बच्चे की आंखों का परीक्षण होना जरूरी है। अभिभावक एवं शिक्षक बच्चों में आंखों की समस्या को नजरअंदाज न करें।
आज बच्चों में कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम की समस्याएं आ रही हैं। आंखें सुखी महसूस होने लगी हैं,आंखें लाल हो रही हैं, सिर दर्द, स्पोंडलाइटिस, कमर दर्द की समस्या उत्पन्न हो रही हैं। ड्राई ऑय की समस्या देखने को मिल रही है। बच्चों का व्यवहार बदल रहा है। इसलिए अभिभावक चिकित्सकीय परीक्षण अवश्य कराएं।उन्होंने अभिभावकों को संदेश देते हुए कहा कि अपने बच्चों को मोबाइल, कंप्यूटर और Tv से दूर रखें।

पत्रकारिता और जनसंचार के *शिक्षक डॉ ललित चंद्र जोशी ‘योगी’ ने कहा कि मोबाइल और कंप्यूटर की संस्कृति ने जहां कई समस्याएं हल की हैं वहीं सैकड़ों समस्याएं उत्पन्न भी की हैं। सभी लोग इसका प्रयोग कर आभासी जीवन जीने लगे हैं। लोगों का जीवन बदल रहा है, जीवन शैली बदल रही है, व्यवहार बदल रहा है।आज लोग मोबाइल में हमेशा व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। बच्चे सड़कों ऑयर मोबाइल स्क्रीन पर आंखें गढ़ाए रहते हैं। सोशल मीडिया में जिस तरह से बालक, युवा वर्ग डूबा हुआ है उससे उनकी याददाश्त भी कमजोर हो रही है, आंखें खराब हो रही हैं, व्यवहार बदल रहा है। उनकी *रचनात्मकता प्रभावित हो रही है। उनके चेहरे के भाव समाप्त हो रहे हैं। आज पढ़ाई के लिए इनका प्रयोग कम और अनावश्यक चीजों की खोज के लिए ज्यादा प्रयोग हो रहा है। बच्चों की जिज्ञासा समाप्त हो रही है। बालक और युवा वर्ग अधिक से अधिक समय मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया को दे रहे हैं,जो एकाकीपन को बढ़ावा देगा। युवा चिढ़चिढ़ेपन से ग्रस्त हो जाएंगे, उन्हें मोबाइल और कंप्यूटर की लत पड़ जाएगी,जो समाज के लिए चिंतनीय है। यहां तक कि झूठ, फरेब, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता भड़काने के लिए इसका प्रयोग बढ़ने लगा है। * इंटरनेट में अश्लील सामग्री का भंडार पटा हुआ है, जिसके प्रभाव में आकर युवाओं का नैतिक और चारित्रिक पतन होना लाजमी है। युवाओं में अवसाद ग्रस्त होने की घटना बढ़ रही है। ऐसे में चिकित्सकों, समाजशास्त्री और मनोचिकित्सकों के सामने चुनोतियाँ खड़ी होंगी। मोबाइल और कंप्यूटर की पैड में अँगुली चलाने से पीड़ा होने लगेगी। साइबर क्राइम बढ़ने लगेंगे। वह भटक जाएंगे। उन्होंने कहा कि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों की बात कही जाए तो विद्यार्थी किस तरह से इन संचार साधनों का उपयोग कर रहे हैं,उसपर अभिभावकों की लगातार नजर बनी रहनी चाहिए। संज्ञान में आया हुआ है कि बच्चे अश्लील साइट में लिप्त हुए हैं। वे ग्रुप निर्मित कर गलत दिशा में प्रवृत्त हो रहे हैं। जो समाज के लिए खतरनाक है। आज सभी को इन संसाधनों के सदुपयोग की बातों को नहीं बताया जाता तो युवा गलत धारा में बहने लगेंगे। डॉ योगी ने कहा कि इन सभी स्थिति को देखते हुए सरकारों को इंटरनेट आदि से नकारात्मक भरी सामग्री और अश्लील साइटों को निषिद्ध करना चाहिए।

उन्होंने अपील करते हुए कहा कि शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी निम्न सावधानी बरतें-

१. कंप्यूटर/मोबाइल/TV आदि से14 इंच की दूरी बनाएं।

  1. उपरोक्त संसाधनों पर लगातार काम ना करें।
    3.हर 22 मिनट के बाद बच्चों से कंप्यूटर, लैपटॉप दूर करें।
    ४.समय-समय पर आँखें झपकाते रहें।
  2. बार बार ठंडे पानी से आंखें धोते रहें।
    6.अच्छा भोजन ग्रहण करें।
  3. विटामिन A भरपूर लें। साथ ही पपीता, हरी सब्जी, गाजर आदि खाएं।
    8.नंगे पांव से दूब में चलें।

निवेदक:

डॉ जे सी दुर्गापाल (नेत्र चिकित्सक व पूर्व स्वास्थ्य निदेशक,उत्तराखंड, अल्मोड़ा) व

डॉ ललित जोशी ‘योगी’ (शिक्षक,जर्नलिज्म विभाग, सोबन सिंह जीना,परिसर परिसर)

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